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Sunday, March 8, 2015

Force Majeure - जब कुछ भी काबू में न रहे.... (स्वीडिश फिल्म, 2014)

Force Majeure 2014 में आई एक स्वीडिश फिल्म है (स्वीडिश नाम Turist), जिसको रूबेन आउस्टलैंड ने निर्देशित किया था। फिल्म एक भावनात्मक ड्रामा है, जिसमें आल्प्स के पास एक रेसॉर्ट में छुट्टियां मनाने गए एक परिवार की कहानी है। फिल्म को देखने के बाद जो कुछ इस ब्लॉग के लेखक मे महसूस किया, उसे वैसे ही लिख दिया है।

आपका सबसे क़रीबी आपके सामने डूब रहा है । वह हाथ-पैर मार रहा है छपाक-छपाक और आप किनारे पर खड़े देख रहे हैं । ऐसी स्थिति में आप क्या निर्णय लेते हैं । पहला ख़्याल क्या आता है आपके मन में । क्या कोई ख़्याल आए उससे पहले ही कूद चुके होते हैं बचाने के लिए या कोई निर्णय नहीं ले पाते और बस बेबस हो कर देखते रह जाते हैं। क्या अपनी ज़िन्दगी का डर या यूँ कहें मौत का डर आपकी सोच को अपाहिज सा छोड़ देता है।

अब यह सब बातें यूँ भी सोचिए कि आपको तैरना ही ना आता हो । तब क्या करेंगे । 

यदि आपको दिख रहा है कि मौत से इंच भर की दूरी पर हैं,तो भाग खड़े होना और खुद को बचाना चुनेंगे या अपनों के साथ मर जाना । या फिर क्या ऐसे क्षणों में बुद्धि इतना साथ दे भी पाएगी ।

ऐसे ही एक पल से यह फिल्म उपजती है । एक लगभग त्रासद से क्षण में एक आदमी का अपने पत्नी और बच्चों
को थामने से ज़्यादा खुद को बचा लेने का निर्णय या सिर्फ़ उसका डर या फिर उस एक पल की बदहवासी में सब कुछ भूल जाना । यहीं से पति और पत्नी में एक दरार पड़ती है और पत्नी जो कल तक ख़ुश थी अचानक खुद को एक अजनबी के साथ पाती है । उसके बाद वे दोनों मिल कर कोशिश करते हैं कि सब पहले जैसा हो सके ।

फिल्म में कुछ दृश्य है जो हमारी फिल्मों में देखने को नहीं मिलते ।

कहानी एक बिज़नेसमैन टॉमस और उनकी पत्नी एबा की हैं । उनके दो बच्चे हैं ,हैरी और वेरा ।  परिवार फ्रेंच ऐल्प्स घूमने जाता है और स्कीइंग का लुत्फ़ उठाता है ।वे चार हैं और एक ही कमरे में ठहरे हैं और ऐसे में कोई भी ज़रूरी बात करने के लिए वे दोनों कमरे से बाहर जाते हैं । दूसरे ही दिन जब वे एक रेस्तरां में खाना खा रहे होते हैं ,उनका सामना हिमस्खलन(एवलांश) से होता है । यही वो क्षण है जब पत्नी बच्चों को थाम लेती है और अपने पति को आवाज़ देती है पर वो कहीं नहीं होता ।

इसके बाद से उनके रिश्तों में सब बिखरता जाता है । एक जगह ऐसा दृश्य है कि पति कमरे के बाहर दहाड़ मार कर रो रहा है और पत्नी कुछ भी नहीं कर पा रही । अंदर बच्चे सब सुन रहे हैं और लगातार रो रहे हैं । किसी तरह पत्नी,पति को अंदर लाती है और वहाँ भी वह सिर्फ़ रो रहा है । एक-एक करके दोनों बच्चे आते हैं। माँ सिर्फ़ इतना कह पाती है कि उनका पिता परेशान है । सब ठीक हो जायेगा । और दोनों बच्चे पिता से लिपट कर रोने लगते हैं । यह देख कर कई ख़्याल मन में आते हैं । क्या उस क्षण में इस तरह टूटना पत्नी को उससे और दूर ले जाएगा या क़रीब लाएगा । क्या इस समय पति की ज़िम्मेदारी नहीं थी कि और कमज़ोर होने के बजाय वह पहले से परेशान पत्नी को और तक़लीफ़ ना दे । क्या इससे पत्नी उससे और विमुख होगी या उसके क़रीब आएगी ।

किसी रिश्ते में वह कौन सी सीमा होती है और कौन तय कर पाता है कि आप अपने साथी पर कितना निर्भर कर  सकते हैं,कितना मांग सकते हैं और वह कौन सी स्थिति होती है जब कोई साथ छोड़ने तक के निर्णय तक पहुँच जाता है । 

कहानी अंत में फिर पति को मौका देती है कि वह अपने परिवार को बिखरने से बचा सके ।

पति जब दहाड़ें मार कर रो रहा होता है तब  दिमाग़ में बदलापुर के वरुण धवन याद आते हैं । काश कहीं भी एक बार ही सही उन्होंने ऐसा अभिनय कर लिया होता । अपने साथी के प्रति पाली हुई उम्मीदों के टूटने ,और उससे  खुद में पैदा हुई ग्लानि को पत्नी ने बेहतरीन तरीके से अभिव्यक्त किया है । वहीं लगातार अपनी कमी को ढाँपते हुए,पहले झूठ बोलना और फिर एक चुप्पी को साध लेना और जब असहनीय हो जाए तब फूट पड़ना,हर दृश्य में पति का अभिनय कमाल का रहा है ।

फ्रेंच ऐल्प्स को खूबसूरती से कैप्चर किया गया है और बैकग्राउंड म्यूज़िक कुछ ऐसा ही कि जब भी आता है ,आप
कुछ अप्रत्याशित होने की आशंका से भर जाते हैं । पृष्ठभूमि में परिवार स्वीडन का रहने वाला है और फिल्म अंग्रेज़ी और स्वीडिश भाषा में है । फ़िल्म के नाम का ही मतलब है कि ऐसी घटना जिसको नियंत्रित करना ,क़ाबू में रखना मुश्किल हो । और होता भी ऐसा ही है। कितनी बार तो हमें खुद भी लगा होगा कि अरे !  यह कैसे हो गया? सब तो हाथ में ही था...अपनी ही बात थी! फिसल कैसे गया? बाहर फिल्मों में वो स्वतंत्रता है कि एक परिवार में जो घट सकता है वो वैसा  का वैसा दिखा पाते हैं । हमें तो हमारे नए सेंसर सदस्यों के कारण और पीछे धकेला जा रहा है । 


कहीं कहीं ऐसा लगता है कि काश आप कहानी का हिस्सा हो पाते और सब कुछ बिखरता हुआ देख किसी को समझा पाते कि यहीं रुको । अपनी सोच को बिखरने की दिशा में और आगे मत ले जाओ । आगे सब बहुत मुश्किल ही होगा।

उम्मीद करता हूँ हम भी फिल्मों में कहानी कहना शुरू कर पाएं !




प्रदीप अवस्थी, उत्तर प्रदेश के रामपुर के रहने वाले हैं, थिएटर से निकले हैं सो पक्के और गंभीर अभिनेता हैं..किताबों और ख़ुद के साथ ने अंदर के लेखक और कवि को भी बाहर ला खड़ा कर दिया है...अपनी कविताओं के लिए आजकल खूब चर्चा पा रहे हैं...पढ़िए इनका गद्य भी...प्रदीप ने वादा किया है कि Mean-मेख के लिए लिखते रहेंगे। इनका पता है https://www.facebook.com/pradeep.awasthi.khwab


इस फिल्म के बारे में अधिक जानकारी के लिए http://en.wikipedia.org/wiki/Force_Majeure_%28film%29 पर जाएं।



Tuesday, February 24, 2015

83वां ऑस्कर, 2015...(2) द ग्रैंड बुडापेस्ट होटल - रंग, संगीत, दृश्य और जादू...




द ग्रैंड बुडापेस्ट होटल इस साल 4 ऑस्कर जीतकर बर्डमैन के साथ पहले नंबर पर रही है। फिल्म देख चुके लोग जानते हैं कि वो इससे भी ज़्यादा अवार्ड डिज़र्व करती थी। बहरहाल बात करते हैं कि फिल्म ने किन श्रेणियों में ऑस्कर जीता। वेस एंडरसन की द ग्रैंड बुडापेस्ट होटल ने बेस्ट प्रोडक्शन डिज़ाइन, बेस्ट कॉस्ट्यूम डिज़ाइन, बेस्ट मेकअप एंड हेयरस्टाइलिंग और बेस्ट ऑरिजनल स्कोर का अवार्ड जीता । फिल्म देखते हुए आप सहज़ अंदाज़ा लगा सकते हैं कि फिल्म को इन श्रेणियों में इस साल कोई पछाड़ ही नहीं सकता था। पूरी फिल्म ऐसी है मानो किसी ने कैनवास पर खूबसूरती के साथ रंग छिटका दिए हों। कानों में मिठास घोल देनेवाले संगीत के साथ आपको फिल्म किसी खूबसूरत यात्रा की तरह लग सकती है।
एडम स्टॉकहौसेन और एना पिनॉक
फिल्म की शूटिंग जर्मनी में की गई है। ज़ाहिर है कि फिल्म द्वितीय विश्वयुद्ध के आसपास बुनी गई है तो सैट और कलाकारों के लुक पर मेहनत होती ही । लिफ्ट से लेकर होटल और आलीशान घर से लेकर ट्रेन तक आप प्रोडक्शन डिज़ाइनर एडम स्टॉकहौसेन और सेट डेकोरेटर  एना पिनॉक की मेहनत देख सकते हैं। दोनों ने पहली बार ऑस्कर जीता है। इससे पहले स्टॉकहौसेन के काम को फिल्म 12 years a slave के लिए भी खासी तारीफ मिली थी और वे बेस्ट प्रोडक्शन डिज़ाइन की श्रेणी में नॉमिनेट भी हुए थे। अपने करियर की शुरूआत न्यूयॉर्क के थिएटरों में बतौर इलैक्ट्रीशियन करनेवाले स्टॉकहौसेन ने प्रोडक्शन डिज़ाइनिंग की दुनिया में एक अलग मुकाम  हासिल कर लिया है। एना पिनॉक के काम को भी Life of Pie में खासी तारीफें हासिल हुई थी।
द ग्रैंड बुडापेस्ट होटल के हर दृश्य में आप आसपास के माहौल को महसूस करते हैं। खासतौर पर फिल्म की तासीर के मुताबिक रंगों का चयन आपको हैरान करता चलता है। यही शानदार काम कलाकारो की कॉस्ट्यूम के मामले में भी जारी रहा। द ग्रैंड बुडापेस्ट होटल का मुकाबला इस श्रेणी में Inherent Vice, Into the Woods, Maleficent, Mr. Turner से था। इटली की कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर मिलेना कॉनिनेरो ने अपने शानदार काम की बदौलत चौथी बार ऑस्कर जीता। महान डायरेक्टर स्टेनले कुब्रिक की फिल्मों में अपने काम से चर्चा में आई मिलेना की रंग-बिरंगी कॉस्ट्यूम्स का जादू सिर चढ़कर बोला। कॉमेडी फिल्म होने के नाते मिलेना का काम वाकई बढ़ गया था।  एक किरदार मैडम डी की खूबसूरत ड्रेस को तो दर्शक फिल्म के बाद भी याद रखते हैं।
बेस्ट मेकअप एंड हेयरस्टाइलिंग का ऑस्कर भी द ग्रैंड बुडापेस्ट होटल के खाते में ही आया है। फ्रांसिस हेनन और मार्क कूलिर का ये पहला ऑस्कर था। 54 साल की टिल्डा स्विन्टन को 83 साल की मैडम डी बनाने के लिए उन्होंने घंटों मेकअप किया और शरीर पर 11 जगह प्रोस्थेटिक मेकअप का प्रयोग किया।
जैसा कि पहले ही ज़िक्र हुआ फिल्म कैनवास पर उभरती तस्वीर जैसी है लेकिन बैकग्राउंड में एलेक्ज़ेंडर डेस्प्लेट के संगीत ने तो जादू ही छिड़क दिया। एलेक्ज़ेंडर की एक फिल्म The Imitation Game भी इस श्रेणी में नॉमिनेट हुई थी।
बहरहाल मलाल इस बात का है कि द ग्रैंड बुडापेस्ट होटल को बेस्ट डायरेक्टर और बेस्ट सिनेमाटोग्राफी का ऑस्कर नहीं मिल सका। दरअसल इसके पीछे एक वजह ये भी रही कि Birdman को साल के आखिर में सीमित थिएटर्स में रिलीज़ करके ऑस्कर की नॉमिनेशन पा ली गई। इसी तरह Whiplash,Mr.Turner और American Snipper को भी साल के अंत में सीमित थिएटर्स में रिलीज़ कर दिया गया। निश्चित ही ऐसा ना होता तो कई और श्रेणियों के ऑस्कर पर भी द ग्रैंड बुडापेस्ट होटल का कब्ज़ा होता।

फिल्म का ट्रेलर





नितिन ठाकुर

लेखक, टीवी पत्रकार रहे हैं, प्रिंट और वेब के लिए भी लिखते हैं। फिलहाल स्वतंत्र और आवारा हैं। फेसबुक पर आधी रात की ख़ब्त के नाम से चर्चित रहे और इसी नाम का ब्लॉग भी लिखते हैं। इन से https://www.facebook.com/nitin.thakur009 अथवा thakurgalaxyy@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है। 

किसी ने कहा था...

Photography is truth. The cinema is truth twenty-four times per second.
फोटोग्राफी सत्य है। सिनेमा, सच के 24 फ्रेम प्रति सेकेंड हैं।
जीन-लुक गोदार्द