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Tuesday, April 28, 2015

क़िस्सा - इस फ़िल्म के कैमेरे पर इतनी कालिख किसने छिड़क दी...

(एक रोज़ प्रदीप से फिल्म क़िस्सा पर बात हुई और लम्बी बात होने के कई दिन बाद उन्होंने ये लेख भेजा...इसको व्यस्तता के चलते अब प्रकाशित कर पा रहा हूं...लेकिन इसको एक अहम टिप्पणी मानिए और जो इस फिल्म के अंत और आदि को लेकर अभी तक आश्वस्त न हों, एक बार इसको पढ़ें - मॉडरेटर)


 र्ज़ कीजिए कि दिल्ली और मुंबई या किसी भी बड़े शहर में जहाँ हम रहते है ,कोई कानून व्यवस्था न बचे और अपनी लड़ाई हथियारों से खुद ही लड़नी पड़े । किसी पड़ोसी शहर या मुल्क के हमले के डर से हमें अपना घर छोड़ कर भागना पड़े और इतना भी समय ना हो कि ज़रूरी सामान ही बटोर सकें । झुंडों में लोग एक दूसरे से लड़ते-झगड़ते,गिरते पड़ते निकल पड़ें ।थोड़ा ग़ौर से सोचिए । चल तो दें लेकिन पहुँचना कहाँ हैं ,यह  ना पता हो। रास्ते में लोगों की संख्या कम होती जाए । कौन कहाँ कब कट गया ,किसका बलात्कार हो गया ,किसे कौन से नाले में फ़ेंक दिया गया,कौन पागल हो गया,कुछ पता ही ना लगे । इस बात पर कितना भी ज़ोर डाल कर सोचा जाए ,सोच नहीं पाएँगे ,क्योंकि हमारे पास सोचने का समय नहीं है । हमें झण्डा फहराना है,लड्डू खाने है,और पड़ोसी मुल्क को गाली देनी है । यही सिखाया गया है और ख़बरदार जो इसके आगे कुछ भी कहा ।

जो दिन आपको आज़ादी का दिन लगता है,मुझे विभाजन और विस्थापन का दिन लगता है ।  

तो ऐसे ही समय में अम्बर सिंह (इरफ़ान) को अपनी पत्नी और तीन बेटियों के साथ अपना घर छोड़ना पड़ता है। वह कैसी परिस्थितियाँ होंगी जब गाँव की औरतों को पड़ोसी गाँव (जो अब दुसरे मुल्क़ का हिस्सा है )  के हमले के डर से रात में अपना गाँव छोड़ कर जाना पड़े और किसी एक औरत को ऐसे ही डर और मनहूसियत के बीच बच्चा पैदा करना पड़े । रात है । जंगल है । एक औरत  ऐसी स्थिति में बच्चा जनती है ।

ऐसी बहुत सी कहानियों में यदि आपको देश की आज़ादी दिखती है और विभाजन की त्रासदी नहीं,तो इसमें दोष इस बात का है कि हमें बचपन से क्या रटाया गया है । इन्हीं परिस्थितियों में मेहर (टिस्का )जो अम्बर सिंह की पत्नी है ,बेटी को जन्म देती है जो की तीसरी है ।


वह कैसी सनक होगी जब चौथी दफ़े भी बेटी होगी और उसे बेटे की तरह पाला जाएगा । 

जब एक बच्चा जन्म लेता है,तब कैसे पहचान की जाती है कि वह लड़का है या लड़की और ऐसे में कोई वहाँ तक बिना पहुँचे फैसला कर ले कि बच्चे को उम्र भर प्रकृति के नियम के विरुद्ध पाला जाएगा ।वह कैसी सनक होगी।

एक लड़की जिससे उसका लड़की होना छीन लिया गया । एक पिता जो जीवन भर अपने बनाए झूठ और सनक में जीता रहा और एक माँ जिसकी आत्मा को चुप रहना छीलता रहा और वह छिलती रही ।

एक बच्ची का लड़की होना तो छुपाया जा सकता है लेकिन एक वयस्क का स्त्री होना नहीं । एक उम्र में कपड़ों पर ख़ून का रँग उतरना शुरू होता है । कपड़ों को हज़ारों लाखों बार जलाया जा सकता है लेकिन देह अपना रँग नहीं जला सकती । 

फिर अपने जुनून और पागलपन को बचाए रखने के लिए दो ज़िंदगियों को ऐसी आग में झोंक देना जिसे बुझाने के लिए अभी कोई पानी नहीं बना । एक समय के बाद यह ऐसा बोझ बन जाता है जिसे लादना,सब कुछ भस्म हो जाने से बचाने के लिए ज़रूरी है ।

कुँवर (तिलोत्तमा) का क़िरदार जितना जटिल है,उसे उतनी ही बारीक़ी से निभाया गया है । जब वह अपनी माँ के पास बैठ कर उससे बात करना चाहती थी ,उसे क़सरत कराने के लिए एक पहलवान लाया गया । जब वह अपनी बहनों के साथ गाने गाते हुए लोहड़ी माँगने गली-गली चहकना चाहती थी उसे बन्दूक थमा दी गई और शिकार करना सिखाया गया । एक झूठ जिसे सब जीना शुरू करते हैं और फिर उम्र भर उसके पीछे छिपे सच को नकारते हैं । वहीं दूसरी और नीली(रसिका) जो यह पता लगने पर कि उसे एक स्त्री से प्रेम हुआ है,हँस रही है या रो रही है पता नहीं चलता ।

पूरी फ़िल्म अपने साथ एक स्याह रँग ले कर चलती है । 

अंत में ये सारा समाज,यह सारी पुत्र की इच्छाएं, दो स्त्रियों को एक हवेली में बंद हो कर रहने के लिए मजबूर कर देती हैं । यहाँ एक स्त्री ही दूसरी स्त्री की देह में छुपे झूठ की मुक्ति का ज़रिया बनती है ।

एक जगह कुँवर (तिलोत्तमा) का कहना है -”मैं जब वो कपड़े पहनती हूँ तो ऐसा लगता है कि सारे शरीर में बिच्छू रेंग रहे हैं । कुछ समझ नहीं आता कि मैं कौन हूँ । “

निर्देशक अनूप सिंह ने जादुई यथार्थवाद का सहारा लिया है जहाँ यह आज़ादी है कि आप फ़िल्म का कौन सा सिर पकड़ कर आगे चलते हैं । अंत में कौन मर चुका है या कौन ज़िन्दा है,इससे ज़रूरी यह हो जाता है कि पितृसत्ता बरक़रार है । पितृसत्ता का सीधा सम्बन्ध ताक़त से है । जिसके पास ताक़त होगी,एकाधिकार होगा ,उसका निरंकुश हो जाना लगभग तय है,फिर वह चाहे पुरुष हो या स्त्री । और जो भी इसके ख़िलाफ़ बोलेंगे,वे सँख्या में चंद होंगे और उन्हें कटघरे में खड़ा किया जाता रहेगा ।

“बचपन से आग पालेंगे,तो घर तो जलेंगे ही । आप की दी हुई बन्दूकों से वे एक दिन आप को ही गोली मारेंगे । जब इंसान,जानवर की ज़िन्दगी जीना तय कर लेता है तो उसकी हर मुश्किल का हल और खौफनाक होता जाता है । रेगिस्तान में जहाँ पानी होगा,उसे अशुभ माना जाए । नीलियों को छत की मुँडेरी पर बैठकर आँगन में गिर जाना होगा,उसी आँगन में जहाँ एक कूँए में लाश फेंकी जाती है ।” 

जब उन्हें साबित करना होगा अपना स्त्री होना,तब क्या उनके पास यही आख़िरी विकल्प छोड़ा जाएगा कि अपनी नंगी छातियाँ दिखा दी जाएँ । तब तक क्या इसी ख़ुद के रचे फ़रेब के संसार में कुछ और बन कर जीना पड़ेगा ।

बैकग्राउंड म्यूज़िक शुरुआत से ही फिल्म में ऐसी मनहूसियत भर देता है जैसा कि अम्बर सिंह का किरदार है । फ़िल्म की पृष्ठभूमि पंजाब की है ।

और मैं यह सोचता हूँ कि
“इस फ़िल्म के कैमेरे पर इतनी कालिख किसने छिड़क दी ।” 

प्रदीप अवस्थी मूलतः थिएटर औऱ फिल्म अभिनेता हैं...मुंबई में रहते हैं...रामपुर के रहने वाले हैं...और कमाल की कविताएं लिखते हैं...कम लिखने और बहुत सोचने वाले आदमी हैं...आप इनसे ही मिलने जाएं तो हो सकता है कि कई घंटे इनके सामने बैठे रहें...इनसे बात भी न हो और आप लौट आएं...प्रदीप खूब फिल्में देखते हैं और भाया तो उस पर लिखते भी हैं...प्रदीप मीन-मेख के सक्रिय लेखक हैं...
सम्पर्क करें....
https://www.facebook.com/pradeep.awasthi.khwab

3 comments:

किसी ने कहा था...

Photography is truth. The cinema is truth twenty-four times per second.
फोटोग्राफी सत्य है। सिनेमा, सच के 24 फ्रेम प्रति सेकेंड हैं।
जीन-लुक गोदार्द