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Tuesday, March 17, 2015

फिर छिड़े रात, बात फूलों की... सागर सरहदी...तन्हाई का सागर (श्रृंखला)


ये Mean-मेख की विशेष श्रृंखला है, जिसका शीर्षक है फिर छिड़े रात, बात फूलों की... जिस में हम बात और मुलाक़ात करने की कोशिश करेंगे, सिनेमा के उन चेहरों और आवाज़ों से, जिनको आप भूल चुके हैं...या फिर आपको वो याद तो हैं, लेकिन उनके हालात आपको पता तक नहीं हैं...ढूंढ निकालते हैं, उनको...जिनको आप बरसों चाहते रहे...पसंद करते रहे...इस अंक में कभी-कभी, सिलसिला, चांदनी लिखने और बाज़ार जैसी शाहकार
बनाने वाले सागर सरहदी से मुलाक़ात और उनका दर्द...

 (यह लेख अतीत में दैनिक भास्कर में प्रकाशित हो चुका है, अतः कॉपीराइट सुरक्षित है।)

मील का पत्थर बन चुकी अनगिनत फिल्मों की कहानियां और संवाद रचने वाले, 81साल के सागर सरहदी ने शादी नहीं की, इश्क खूब किया और अब मुस्कुराते हुए ज़िंदगी बिता रहे हैं। वे जोश से लबालब हैं, लेकिन अफसोस! शामों का सामना करते हुए अकेलेपन से भी घिर जाते हैं। उनकी मुट्ठी में बहुत-से अफसाने कैद हैं। हमने एक दोपहर सागर के साथ बिताई। उन लम्हों की कुछ झलकियां, कुछ बातें !

सागर सरहदी
सागर सरहदी ने अनगिनत फिल्में लिखीं, स्क्रीन-प्ले तैयार किए, डायलॉग रचे-बुने। सनद के लिए कुछ नाम गिनाते चलें — `कभी कभी', `सिलसिला', `अनुभव', `चांदनी', `दीवाना', `कहो न प्यार है', `फासले', `रंग' और `नूरी'! न जाने कितने ही सितारे सागर के संवादों की चमक में और ज्यादा चमकने लगे। इनमें अमिताभ बच्चन, संजीव कुमार, रेखा से लेकर शाहरुख खान और रितिक रोशन जैसे स्टार शामिल हैं। पर बात यहीं पूरी नहीं होती। सागर का एक और शाहकार काबिल-ए-तारीफ है — बाज़ार! कहानी सागर सरहदी ने लिखी, प्रोड्यूस की और डायरेक्शन करने के लिए भी आगे आए। 
जब स्टोरी सुनाने के लिए कुछ दोस्तों और जानने वालों को लंच पर बुलाया तो दावत के बाद ज्यादातर ने कहा — `मत बनाइए सागर साहब इस कहानी पर फिल्म, बन नहीं पाएगी। बन गई तो रिलीज नहीं होगी और अगर सिनेमाघरों तक ले भी आए तो चलेगी नहीं!' सरहदी को अपने काम पर यकीन था। `बाज़ार' बनी, दर्शकों तक पहुंची और फिर तो इतिहास ही बन गई। यकीनन, सागर का नाम और उनका काम कल रची जाने वाली हिस्ट्री का हिस्सा होगा, पर उनकी मौजूदा हालत पर नज़र डालें तो जोश और अफसोस, एक साथ होगा।
जोश की बात ये कि दो बार फिल्म फेयर अवॉर्ड हासिल करने वाले सागर सरहदी इस घड़ी तक, यानी उम्र के 81वें मुकाम पर भी हौसले, क्रिएटिविटी और उमंग से लबालब हैं और अफसोस इसका कि शाम होते ही वे घबराने लगते हैं, बल्कि `डर' जाते हैं।



* संघर्ष के दिन : भाई, भाभी, बच्चे और सागर सरहदी - मुंबई में एक छोटे से कमरे में सब एकसाथ रहते थे। नित्यक्रिया के लिए हर दिन तीन किलोमीटर दूर जाना होता था। चालीस रुपए महीने ही कमाते थे। पिता ने शादी तय कर दी, इससे खफा सागर ने चिट्ठी लिखकर इनकार किया।
* वाम विचारधारा से जुड़े रहे। उर्दू-हिंदी ड्रामों के बड़े राइटर। फिलहाल, बाज़ार की मेकिंग पर लिख रहे हैं किताब।

कभी कभी मेरे दिल में....
मुंबई के सायन में उनके नाम दो फ्लैट हैं, जिन्हें जोड़कर एक बना रखा है, पर वहां नहीं जाते। अंधेरी वेस्ट इलाके की चंद्रगुप्त बिल्डिंग में एक करीबी रिश्तेदार के फ्लैट में दिन भर हाजिर रहते हैं। यकीनन, कद्रदानों के साथ। ज़िंदगी की शाम में वे बेहद अकेले हैं। आसपास मौजूद कद्रदानों की भीड़ में भी तनहा। हालांकि एक क्रिएटिव आदमी खुद के तनहा होने की बात कैसे कबूल करे। वे बार-बार जोर देते हैं, `इतने दोस्त साथ तो हैं, मुझे किसी का इंतज़ार नहीं!'
पिछले महीने चार दिन अस्पताल में गुजार कर आए सागर कहते हैं, `शाम होती है, मैं नर्वस हो जाता है। क्या करूं यार...!' इस सवाल पर, `सुना था कि तबियत इन दिनों कुछ खराब चल रही है' सागर कहते हैं - `खबर पक्की है, पर अब ठीक हूं। हमारा एक फैमिली फिजीशियन था, उसको मैंने दिखाया. था..'। इसी बीच आसपास मौजूद लोगों में से किसी को चाय के साथ बिस्किट की तलब भी लगी और सागर का रुख उसकी ज़रूरत की ओर हो गया, `अरे ज़नाब, दरवाज़ा तो खोलिए दराज का, वहां बिस्किट और भी होंगे, इतनी जल्दी खत्म नहीं होते हमारे यहां।' जैसे कह रहे हों, `मेरी पोटली में अफसानों की कोई कमी नहीं!' हरपिस से पीड़ित हैं। ये मर्ज जल्दी ठीक नहीं होता, लेकिन बीमारी भी उन्हें रोक नहीं पाई है। फिलहाल, जम्मू के एक नाटककार का लिखा प्ले पढ़ रहे हैं। बताते हैं कि कुछ दिन बाद वहां जाऊंगा। एक छोटी-सी फिल्म इस पर बनाने का मन है। ठीक वैसी ही, जैसी `नूरी' थी!
`अभी और लिखने का जुनून बाकी है?' 
लेखक - सागर सरहदी
सवाल सुनने के बाद पलकें मींचकर फिर आंखेें खोलते हैं सागर, `देखो मियां, लिखने की बात न करना। एक बार मीनाकुमारी ने पूछ लिया था - सागर साहब, क्या-क्या लिख देते हैं आप। समझ में नहीं आता... तो मैंने उनसे भी कह दिया था, मैंने कभी तुम्हारी एक्टिंग पर सवाल किया है जो तुम मेरी लिखाई की बात कर रही हो? इसलिए ये जान लीजिए, मैं जब तक जियूंगा, तब तक लिखूंगा।'
सागर ने पूरे कैरियर में सबसे ज्यादा रूमानी फिल्में ही लिखीं, फिर भी शादी नहीं की। हां, छब्बीस बार इश्क किया। उनकी बातें कुछ अलग ही होती हैं, `कोई भी क्रिएटिव इंसान शादी भुगत नहीं सकता। वह एक साथ काम और बीवी या शौहर से इंसाफ नहीं कर सकता। क्रिएटिव बंदों के लिए बहुत मुश्किल है। विवाह जरूरी है कि नहीं है, इस बारे में मैं नहीं बोल सकता, लेकिन आप अगर अपने प्रोफेशन में कुछ नया करना चाहते हैं तो शादी को निभाना मुमकिन नहीं है। कुछ बेहतरीन हासिल करने के लिए आपको सारी उम्र पढ़ना पड़ता है, किताबों से दोस्ती रखनी होती है, बहुत से एहसास संभालने होते हैं तो ऐसे में शादी कहां से संभालेंगे? इश्क जरूर करना चाहिए। मैं अपनी ज़िंदगी से खुश हूं। कई बार दिल लगाया। कुछ लड़कियां साथ रहीं, कई रिश्ते बीच में ही छूट गए। उनका ग़म भी है, खैर...!' 


देख लो आज हमको जी भर के...

कुछ साल पहले सागर सरहदी ने `चौसर' बनाई, लेकिन उसे खरीदार नहीं मिले। जो आए भी, वे अपनी शर्तों में सागर को उलझाने की कोशिश करके भी नाकाम रहे। सुनते हैं कि यश चोपड़ा ने भी ये फिल्म खरीदने की कोशिश की थी, पर न जाने क्या हुआ कि बात बन नहीं पाई।
खास क्रिएटिव ज़िद से लैस सागर की सेहत खराब जरूर रहती है, लेकिन वे न हारे हैं, न थके हैं। जल्द ही हैदराबाद जाएंगे, ताकि `बाज़ार-2' का रिसर्च पूरा कर सकें। शहीद अशफाक उल्ला खां पर भव्यतम् धारावाहिक बनाने के लिए प्रोजेक्ट तैयार कर चुके हैं और तमाम कहानियां पढ़ते रहते हैं। कुछ रचने-बनाने के ख्वाब बचाए रखना ज़रूरी होता है न!
सागर को इस बात का अफसोस नहीं कि पुराने ज़माने के लेखकों, निर्देशकों की ओर सितारे पलटकर नहीं देखते। वे कहते हैं, `किसी का इंतज़ार ही नहीं है। उनकी अपनी ज़िंदगी है, प्रायरिटीज हैं। अब जब आजकल `ग्रैंड मस्ती', `किल दिल' और `बीए पास' जैसी फिल्में चल रही हैं तो किसी फुर्सत है कि `सिलसिला' और `कभी कभी' वालों को याद करे!'
लिखता रहूंगा...और क्या..?
सागर को अक्सर अपना गांव याद आता है। 11 मई, 1933 को एबटाबाद में जन्मे सागर  बंटवारे के साल में आठवीं क्लास की पढ़ाई अधूरी छोड़कर दिल्ली चले आए। किंग्जवे कैंप में ठहरे। नवीं से ग्यारहवीं तक वहीं पास की और एक दिन मुंबई आ गए। ये शहर, जिसने उनकी किस्मत बदल दी। एक प्ले राइटर, एक एक्टिविस्ट और एक अफसानानिगार किस तरह सिनेमा के परदे पर अलग-अलग करामातें बुनने लगा, ये महसूस करने की बात है, लिखी नहीं जा सकती। हालांकि सारी ज़िंदगी शोहरत और दौलत के बीच घिरे रहने वाले सागर को कभी-कभी टीस होती है, `वो कौन-सी ताकत है, जिसने तय किया कि मैं अपने गांव में नहीं रह सकता। तीन तरफ से दरिया और पहाड़ों से घिरा एबटाबाद जन्नत है और मुझे इश्क ने जितनी रूमानियत दी है, उतनी ही कुदरत ने, जो मेरे गांव में रहती है!'

ये विडंबना है कि पूरी ज़िंदगी सेल्युलाइड के साथ गुजार चुके सागर आज भीड़भाड़ भरे शहर में तनहा हैं। उनके पास पैसों की कुछ खास कमी नहीं, पर ऐसे दोस्त आसानी से कहां मिलते हैं, जो सच्चे हों और सागर सरहदी से सिर्फ उनकी कलम के लिए मोहब्बत करें! एक लीजेंड को ये एहसास दिलाना भी हमारा फर्ज है कि वह तनहा नहीं है। उसके चाहने वाले उसके साथ हैं। वक्त को भी इंतज़ार है, उस खूबसूरत लम्हे का, जब सागर फिर सक्रिय होंगे, उनकी तनहाई दूर होगी और सारे आलम में फिर छिड़ेगी, बात और रात, फूलों वाली!

चंडीदत्त शुक्ल

उत्तर प्रदेश के गोंडा में जन्मे चंडीदत्त शुक्ल, स्वभाव से कवि हैं और पेशे से पत्रकार। लखनऊ, जालंधर, दिल्ली से मुंबई में आ पहुंचे हैं और दैनिक भास्कर वरिष्ठ फिल्म पत्रकार हैं। प्रतिदिन 5 के औसत से कविताएं लिखने वाले चंडीदत्त शुक्ल, व्यवसायिक माहौल में भावनाओं से पीड़ित व्यक्ति हैं। लेखन के अलावा दोस्तों से मिलना और पूरी सब्ज़ी खाना पसंद है। इन से फेसबुक पर https://www.facebook.com/chandiduttshukla?fref=ts और ई मेल पर chandidutt@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

1 comment:

  1. एक शब्द में कहू तो शानदार इंटरव्यू।दिल खुश हो गया पढ़के

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किसी ने कहा था...

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जीन-लुक गोदार्द