मोतिहारी से मड़ियाहूं और दाहेगांव (विदर्भ) से दादरी तक खेतों और गलियों में धनगु महतो पागल हो कर फिर रहा है...उसका बेटा शम्भू महतो, अपनी पत्नी पार्वती और बेटे कन्हैया के साथ हथेली से गिरती मुट्ठी भर मिट्टी को माथे से लगा कर फूट-फूट कर रो रहा है, उसके घुटने इस लायक भी नहीं बचे हैं कि वह उठ कर किसी शहर में जाए और मजदूर बन जाए, किसी कोने में ठाकुर हरनाम खड़ा ठठा कर हंस रहा है और उसकी हंसी की गूंज देश के हर एक महानगर में किसी रिक्शा चलाने वाले, किसी भार ढोने वाले, किसी सब्ज़ी बेचने वाले और किसी फुटपाथ पर सो रहे न जाने कितने शम्भुओं की पुकारों में गूंजती है। पूरा देश जब दो बीघा ज़मीन बन जाए और उसकी बोली लगा कर, किसान को नीलाम किया जा रहा हो, ऐसे में हम सिवाय 1953 की इस फिल्म के अलावा क्या याद कर के, शहर में अपने घरों में आराम से बैठे होने को कोस सकते हैं कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं लेकिन सब देखते रहेंगे...जबकि किसी कोने में बैठा कोई बिमल रॉय इसको कागज़ पर उतारता रहेगा कि कभी फिर मौका मिले...तो फिर तारीख की शक्ल में मुस्तकबिल रच दे।
हर साल भूमि अधिग्रहण और इससे जुड़े क़ानून का शोर मचता है। हर साल हज़ारों किसानों की ज़मीन छीन कर, उन्हें ज़मीन के मालिक से, सड़क का मजदूर बनने को मजबूर कर दिया जाता है। हर साल लाखों लोग गांवों से पलायन कर के, शहर में काम की तलाश में आते हैं और जो नहीं आते हैं, उनकी खुदक़ुशी महज एक आंकड़े के तौर पर दर्ज हो जाती है। बचपन से भारत को एक कृषि प्रधान देश कहते आते, हम लोगों के लिए अब किसान की मौत सिर्फ एक संख्या है, जिससे हम अंदाज़ा लगा पाएं कि कितने किसानों ने आत्म हत्या की और उसके कारण को लेकर सुविधा के मुताबिक कयास लगा सकें। हम दरअसल अब असहज भी नहीं होते, लेकिन हैरानी की ही बात है कि आज से तकरीबन 61 साल पहले एक फिल्म निर्देशक, भविष्य देख पा रहा था और कलम को सेल्युलाइड पर उतार कर, इतिहास नहीं भविष्य पर्दे पर रच रहा था।
1953 में बिमल रॉय की फिल्म दो बीघा ज़मीन अगर आप ने नहीं देखी है, तो अभी देखिए और समझिए कि किसान और ज़मीन का रिश्ता ही नहीं...उनकी ज़मीनों को छीन कर पूंजीपतियों को दे देने के बाद की स्थिति हम को कल कहां ले जा कर छोड़ेगी। इस फिल्म की कहानी दरअसल वही है, जो आज देश के हर किसान की कहानी है। कम ही होता होगा, जब कोई सिनेमा, भविष्य में जा कर इस कदर सच होता होगा, जिस तरह बिमल रॉय द्वारा लिखी और निर्देशित की गई, दो बीघा ज़मीन।
फिल्म के बारे में बात करने का सबसे सही समय यही है और इसलिए ही नहीं कि देश में भूमि अधिग्रहण क़ानून अब यह तय करेगा कि किसान की ज़मीन दरअसल उसकी नहीं, किसी औद्योगिक घराने या फिर उसकी ही चुनी गई सरकार की मिल्कियत है, बल्कि इसलिए कि हमारी नई पीढ़ी न तो इस फिल्म के बारे में कुछ जानती है और न ही किसानों के आज के हालात के बारे में। इस फिल्म को ख़ुद बिमल रॉय ने ही लिखा था और निर्देशित किया था। फिल्म में बलराज साहनी ने एक उत्तर भारतीय किसान को ज़िंदा ही नहीं किया...जिया भी था।
दो बीघा ज़मीन का नायक शम्भू महतो (बलराज साहनी), एक छोटे से दो बीघा ज़मीन के टुकड़े का मालिक है। उस पर वह खेती करता है और बारिश आते ही झूम कर नाचता और गाता है...वह मिट्टी को मां कह के पुकारता है और उम्मीद लगाए रहता है कि उसका 65 रुपए का कर्ज़, एक दिन उसकी मां, चुकता ही कर देगी। शम्भू का एक बूढ़ा पिता है, धनगु महतो (नाना पालसीकर)...एक बेटा है, कन्हैया (रतन कुमार) और पत्नी है पार्वती...(निरूपा राय), जिसे वह प्यार से पारो कह कर...नए गहनों का वादा कर, ज़मीन बचाने के लिए उसके पुराने गहने भी ले कर बेच आता है...
शम्भू की ज़मीन एक ऐसी ज़मीन के बीच में आ जाती है, जिस पर गांव का ज़मींदार हरनाम सिंह (मुराद), शहर की एक कम्पनी के साथ मिल कर फैक्ट्री लगाना चाहता है। ज़मींदार, शम्भू की ज़मीन खरीद लेना चाहता है लेकिन शम्भू, के इनकार करने पर वह उससे पुराना कर्ज़ चुकाने को कहता है। 65 रुपए का कर्ज़, सिर्फ कलम के थोड़े से खेल से...235 रुपए हो जाता है। एक छोटे किसान के लिए यह रकम बहुत बड़ी है। मामला, अदालत में जाता है और अदालत यह रकम चुकाने के लिए मियाद तय कर देती है। अपनी ही ज़मीन पर खेती करने में अक्षम, शम्भू...कोलकाता पलायन करता है और साथ में जाता है, उसका बेटा कन्हैया। ज़मीन का मालिक अंततः कोलकाता में हाथ रिक्शा मजदूर बन जाता है....बिना कहानी सुनाए, सिर्फ यह जान लीजिए कि शम्भू आखिरकार गांव पहुंचता है, अपने पिता को पागल हो कर, गांव की गलियों में भटकता पाता है और कम से कम मां के ठीक होने की आस में ही खेतों की ओर भागता है, जहां एक फैक्ट्री लग चुकी होती है। लेकिन सिर्फ इतना ही तो दुख नहीं होता है...भारतीय किसान की ज़िंदगी सिर्फ इतने से दुख से पूरी ही नहीं हो सकती और अपनी ज़मीन की मिट्टी उठा कर, माथे से लगाते शम्भू से वह अंजुरि भर मिट्टी भी छीन ली जाती है...क्या आप उस दर्द को महसूस कर सकते हैं, ज़ाहिर है मेरे लिखने से नहीं कर सकते, इसलिए यह फिल्म देखिए।
दरअसल कला, नाटक, सिनेमा किसी की भी शुरुआत से यक्ष प्रश्न और बहस यही रही है, कि सिनेमा किनकी कहानी कहेगा...कौन सी कहानी कहेगा...कैसे कहेगा और क्यों कहेगा कोई विशेष कहानी...सिनेमा...दो बीघा ज़मीन को देख कर यह समझा जा सकता है कि वह कौन सी कहानियां हैं, जो हमारे समय में बिल्कुल नहीं कही जा रही हैं और फिर इस रास्ते पर धीरे-धीरे चल कर यह भी समझा जा सकता है कि वह कहानियां आखिर क्यों नहीं कही जा रही हैं।
इस फिल्म में बलराज साहनी ने शम्भू के किरदार को जिस तरह निभाया है, उसके बारे में बहुत से किस्से हैं, लेकिन दरअसल आज के वक्त में सबसे अहम वह बात है, जो यह फिल्म कहना चाहती थी। जिसे बलराज साहनी की ज़ुबान से बिमल रॉय ने कितनी ही बार इस फिल्म में कहलवाया...
"ज़मीन तो किसान की मां है हुज़ूर...भला कोई अपनी मां को बेचता है?"
वह कौन सा सच्चा डर है, जिसके चलते हर पारो, हर शम्भू से कह उठती है..."मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी...शहर अच्छी जगह नही!" और हर शम्भू की वह कौन सी मजबूरी है कि वह, "जाना ही पड़ेगा..." कह कर शहर चल देता है? और जब वह कोलकाता की सड़कों पर हाथ रिक्शा दौड़ा रहा होता है, उसका बूढ़ा बाप धनगु महतो, अपनी बहू पारो के गहरे पानी में घुस कर सिघाड़े तोड़ लाने पर न जाने किस विरसे में मिले दर्द के कह उठता है,
जिस वक्त बिमल रॉय ने यह फिल्म लिखी, उस समय भूमि अधिग्रहण को लेकर कोई क़ानून नहीं था। उस वक्त उदारीकरण और विनिवेश की आंधी नहीं आई हुई थी। उस वक्त पूंजीपति, सरकार नहीं चलाया करते थे। लेकिन बिमल रॉय देख पा रहे थे कि इस मुल्क में आगे क्या होना है। बिमल राय का शम्भू लगातार 70 दिनों तक रिक्शे पर अपने जैसे ही दिखने वाले लोगों को खींच कर भी आखिरकार अपनी ज़मीन वापस हासिल नहीं कर पाता है। उस पर आग उगलती एक इमारत खड़ी होती है और शम्भू रोता हुआ लौट जाता है...कहां, शहर की ओर...शहर जो दरअसल अच्छी जगह नहीं है...जो दरअसल इतनी खराब जगह है कि वह गांव तक जा पहुंचता है और उसे भी निगल जाता है।
नया दौर में दिलीप कुमार का एक संवाद है..."बाबू, लड़ाई शहर और गांव की नहीं,...लड़ाई मशीन और हाथ की है..." कौन सा वह निजाम और लोकतंत्र है, जो हाथ ही काट देने पर आमादा है?
दो बीघा ज़मीन को देखते वक़्त बस सब कुछ आज के वक्त के हिसाब से रखते चलिएगा...आपको अपने आस पास न जाने कितने शम्भू रिक्शा चलाते और मजदूरी करते दिखेंगे...न जाने कितने कन्हैया, रेलवे स्टेशनों और बस स्टॉपों पर बूट पॉलिश करते मिल जाएंगे, न जाने कितनी पारो, सिर पर ईंट लिए इमारतें बनाती दिखेंगी और घर लौट कर जब आप आईना देखेंगे तो आपकी आंखों में से अचानक बूढ़ा पागल धनगु महतो चीख उठेगा...कि शम्भू और धनगु महतो, दरअसल गोदान के होरी महतो ही हैं, जो कभी दो बीघा ज़मीन में रिक्शा खींचते औऱ गरीबी झेलते पागल हो जाते हैं, तो कभी पीपली लाइव में अपनी ही कब्र से मिट्टी खोदते, उसी में सो जाते हैं।
आप को अगर शम्भू न दिखाई दे, तो अपने आप को दोष मत दीजिएगा...दोष दरअसल हम सबका है, जो शहरों में एक ऐसा समाज बनाते हैं, जो न तो किसी के छप्पर में हाथ लगाता है, न ही हुक्का बांटता है, न ही घर आए अजनबी को भी पानी, गुड़ के साथ ही देता है...हम सब उस पाप के भागीदार हैं, जिसके शिकार विदर्भ से वाराणसी तक के किसान, बुनकर और ग्रामीण हैं...क्योंकि हमारे बिजली, इलाज, बिस्किट और दवाओं के लिए उनकी ज़मीनें छीन कर उनको शहर भेज दिया जाता है और 1953 का शम्भू, 2010 का नत्था बन जाता है।
मुझे पूरा यकीन है कि दो बीघा ज़मीन आपको थोड़ा सा वह समझा पाएगी, जो सरकार आपको बताना नहीं चाहती...लेकिन मुझे यह भी यक़ीन है कि जब तक आप पूरा समझ पाएंगे...तब तक इस मुल्क के सारे शम्भू, रिक्शा खींचते-खींचते अपनी एक मुट्ठी मिट्टी भी गंवा देंगे...हर पारो का एक-एक गहना बिक जाएगा...हर कन्हैया बूट पॉलिश करने से लेकर गांजा बेचना सीख चुका होगा...और हर धनगु महतो पागल हो कर, आपके घर के बाहर आपका इंतज़ार कर रहा होगा...घर से मत निकलिएगा, क्योंकि आपकी दो बीघा ज़मीन तो कहीं थी ही नहीं...और जिसके पास थी, वो उसे हासिल करने के लिए कुछ भी करेगा...
फिल्म न मिले, तो यू ट्यूब के इस लिंक पर पूरी फिल्म देखी जा सकती है...
और यह गाना ज़रूर सुनें...
लेखक अतीत में रेडियो और टीवी के पत्रकार रहे हैं, फिलहाल स्वतंत्र लेखन और अनुवाद करते हैं। फिल्मों के कीड़े हैं और व्यंग्य लेखन की कोशिशें करते रहते हैं।
Writer has been a TV-Radio Journalist but now is a freelance writer and translator. Pretends to be a satirist and indeed is a Cinema Worm!
Can be contacted at - mailmayanksaxena@gmail.com
Writer has been a TV-Radio Journalist but now is a freelance writer and translator. Pretends to be a satirist and indeed is a Cinema Worm!
Can be contacted at - mailmayanksaxena@gmail.com

_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%B0.jpg)







No comments:
Post a Comment