BBO - Blog Box Office

Tuesday, March 17, 2015

फिर छिड़े रात, बात फूलों की... सागर सरहदी...तन्हाई का सागर (श्रृंखला)


ये Mean-मेख की विशेष श्रृंखला है, जिसका शीर्षक है फिर छिड़े रात, बात फूलों की... जिस में हम बात और मुलाक़ात करने की कोशिश करेंगे, सिनेमा के उन चेहरों और आवाज़ों से, जिनको आप भूल चुके हैं...या फिर आपको वो याद तो हैं, लेकिन उनके हालात आपको पता तक नहीं हैं...ढूंढ निकालते हैं, उनको...जिनको आप बरसों चाहते रहे...पसंद करते रहे...इस अंक में कभी-कभी, सिलसिला, चांदनी लिखने और बाज़ार जैसी शाहकार
बनाने वाले सागर सरहदी से मुलाक़ात और उनका दर्द...

 (यह लेख अतीत में दैनिक भास्कर में प्रकाशित हो चुका है, अतः कॉपीराइट सुरक्षित है।)

मील का पत्थर बन चुकी अनगिनत फिल्मों की कहानियां और संवाद रचने वाले, 81साल के सागर सरहदी ने शादी नहीं की, इश्क खूब किया और अब मुस्कुराते हुए ज़िंदगी बिता रहे हैं। वे जोश से लबालब हैं, लेकिन अफसोस! शामों का सामना करते हुए अकेलेपन से भी घिर जाते हैं। उनकी मुट्ठी में बहुत-से अफसाने कैद हैं। हमने एक दोपहर सागर के साथ बिताई। उन लम्हों की कुछ झलकियां, कुछ बातें !

सागर सरहदी
सागर सरहदी ने अनगिनत फिल्में लिखीं, स्क्रीन-प्ले तैयार किए, डायलॉग रचे-बुने। सनद के लिए कुछ नाम गिनाते चलें — `कभी कभी', `सिलसिला', `अनुभव', `चांदनी', `दीवाना', `कहो न प्यार है', `फासले', `रंग' और `नूरी'! न जाने कितने ही सितारे सागर के संवादों की चमक में और ज्यादा चमकने लगे। इनमें अमिताभ बच्चन, संजीव कुमार, रेखा से लेकर शाहरुख खान और रितिक रोशन जैसे स्टार शामिल हैं। पर बात यहीं पूरी नहीं होती। सागर का एक और शाहकार काबिल-ए-तारीफ है — बाज़ार! कहानी सागर सरहदी ने लिखी, प्रोड्यूस की और डायरेक्शन करने के लिए भी आगे आए। 
जब स्टोरी सुनाने के लिए कुछ दोस्तों और जानने वालों को लंच पर बुलाया तो दावत के बाद ज्यादातर ने कहा — `मत बनाइए सागर साहब इस कहानी पर फिल्म, बन नहीं पाएगी। बन गई तो रिलीज नहीं होगी और अगर सिनेमाघरों तक ले भी आए तो चलेगी नहीं!' सरहदी को अपने काम पर यकीन था। `बाज़ार' बनी, दर्शकों तक पहुंची और फिर तो इतिहास ही बन गई। यकीनन, सागर का नाम और उनका काम कल रची जाने वाली हिस्ट्री का हिस्सा होगा, पर उनकी मौजूदा हालत पर नज़र डालें तो जोश और अफसोस, एक साथ होगा।
जोश की बात ये कि दो बार फिल्म फेयर अवॉर्ड हासिल करने वाले सागर सरहदी इस घड़ी तक, यानी उम्र के 81वें मुकाम पर भी हौसले, क्रिएटिविटी और उमंग से लबालब हैं और अफसोस इसका कि शाम होते ही वे घबराने लगते हैं, बल्कि `डर' जाते हैं।

Sunday, March 8, 2015

Force Majeure - जब कुछ भी काबू में न रहे.... (स्वीडिश फिल्म, 2014)

Force Majeure 2014 में आई एक स्वीडिश फिल्म है (स्वीडिश नाम Turist), जिसको रूबेन आउस्टलैंड ने निर्देशित किया था। फिल्म एक भावनात्मक ड्रामा है, जिसमें आल्प्स के पास एक रेसॉर्ट में छुट्टियां मनाने गए एक परिवार की कहानी है। फिल्म को देखने के बाद जो कुछ इस ब्लॉग के लेखक मे महसूस किया, उसे वैसे ही लिख दिया है।

आपका सबसे क़रीबी आपके सामने डूब रहा है । वह हाथ-पैर मार रहा है छपाक-छपाक और आप किनारे पर खड़े देख रहे हैं । ऐसी स्थिति में आप क्या निर्णय लेते हैं । पहला ख़्याल क्या आता है आपके मन में । क्या कोई ख़्याल आए उससे पहले ही कूद चुके होते हैं बचाने के लिए या कोई निर्णय नहीं ले पाते और बस बेबस हो कर देखते रह जाते हैं। क्या अपनी ज़िन्दगी का डर या यूँ कहें मौत का डर आपकी सोच को अपाहिज सा छोड़ देता है।

अब यह सब बातें यूँ भी सोचिए कि आपको तैरना ही ना आता हो । तब क्या करेंगे । 

यदि आपको दिख रहा है कि मौत से इंच भर की दूरी पर हैं,तो भाग खड़े होना और खुद को बचाना चुनेंगे या अपनों के साथ मर जाना । या फिर क्या ऐसे क्षणों में बुद्धि इतना साथ दे भी पाएगी ।

ऐसे ही एक पल से यह फिल्म उपजती है । एक लगभग त्रासद से क्षण में एक आदमी का अपने पत्नी और बच्चों
को थामने से ज़्यादा खुद को बचा लेने का निर्णय या सिर्फ़ उसका डर या फिर उस एक पल की बदहवासी में सब कुछ भूल जाना । यहीं से पति और पत्नी में एक दरार पड़ती है और पत्नी जो कल तक ख़ुश थी अचानक खुद को एक अजनबी के साथ पाती है । उसके बाद वे दोनों मिल कर कोशिश करते हैं कि सब पहले जैसा हो सके ।

फिल्म में कुछ दृश्य है जो हमारी फिल्मों में देखने को नहीं मिलते ।

कहानी एक बिज़नेसमैन टॉमस और उनकी पत्नी एबा की हैं । उनके दो बच्चे हैं ,हैरी और वेरा ।  परिवार फ्रेंच ऐल्प्स घूमने जाता है और स्कीइंग का लुत्फ़ उठाता है ।वे चार हैं और एक ही कमरे में ठहरे हैं और ऐसे में कोई भी ज़रूरी बात करने के लिए वे दोनों कमरे से बाहर जाते हैं । दूसरे ही दिन जब वे एक रेस्तरां में खाना खा रहे होते हैं ,उनका सामना हिमस्खलन(एवलांश) से होता है । यही वो क्षण है जब पत्नी बच्चों को थाम लेती है और अपने पति को आवाज़ देती है पर वो कहीं नहीं होता ।

इसके बाद से उनके रिश्तों में सब बिखरता जाता है । एक जगह ऐसा दृश्य है कि पति कमरे के बाहर दहाड़ मार कर रो रहा है और पत्नी कुछ भी नहीं कर पा रही । अंदर बच्चे सब सुन रहे हैं और लगातार रो रहे हैं । किसी तरह पत्नी,पति को अंदर लाती है और वहाँ भी वह सिर्फ़ रो रहा है । एक-एक करके दोनों बच्चे आते हैं। माँ सिर्फ़ इतना कह पाती है कि उनका पिता परेशान है । सब ठीक हो जायेगा । और दोनों बच्चे पिता से लिपट कर रोने लगते हैं । यह देख कर कई ख़्याल मन में आते हैं । क्या उस क्षण में इस तरह टूटना पत्नी को उससे और दूर ले जाएगा या क़रीब लाएगा । क्या इस समय पति की ज़िम्मेदारी नहीं थी कि और कमज़ोर होने के बजाय वह पहले से परेशान पत्नी को और तक़लीफ़ ना दे । क्या इससे पत्नी उससे और विमुख होगी या उसके क़रीब आएगी ।

किसी रिश्ते में वह कौन सी सीमा होती है और कौन तय कर पाता है कि आप अपने साथी पर कितना निर्भर कर  सकते हैं,कितना मांग सकते हैं और वह कौन सी स्थिति होती है जब कोई साथ छोड़ने तक के निर्णय तक पहुँच जाता है । 

कहानी अंत में फिर पति को मौका देती है कि वह अपने परिवार को बिखरने से बचा सके ।

पति जब दहाड़ें मार कर रो रहा होता है तब  दिमाग़ में बदलापुर के वरुण धवन याद आते हैं । काश कहीं भी एक बार ही सही उन्होंने ऐसा अभिनय कर लिया होता । अपने साथी के प्रति पाली हुई उम्मीदों के टूटने ,और उससे  खुद में पैदा हुई ग्लानि को पत्नी ने बेहतरीन तरीके से अभिव्यक्त किया है । वहीं लगातार अपनी कमी को ढाँपते हुए,पहले झूठ बोलना और फिर एक चुप्पी को साध लेना और जब असहनीय हो जाए तब फूट पड़ना,हर दृश्य में पति का अभिनय कमाल का रहा है ।

फ्रेंच ऐल्प्स को खूबसूरती से कैप्चर किया गया है और बैकग्राउंड म्यूज़िक कुछ ऐसा ही कि जब भी आता है ,आप
कुछ अप्रत्याशित होने की आशंका से भर जाते हैं । पृष्ठभूमि में परिवार स्वीडन का रहने वाला है और फिल्म अंग्रेज़ी और स्वीडिश भाषा में है । फ़िल्म के नाम का ही मतलब है कि ऐसी घटना जिसको नियंत्रित करना ,क़ाबू में रखना मुश्किल हो । और होता भी ऐसा ही है। कितनी बार तो हमें खुद भी लगा होगा कि अरे !  यह कैसे हो गया? सब तो हाथ में ही था...अपनी ही बात थी! फिसल कैसे गया? बाहर फिल्मों में वो स्वतंत्रता है कि एक परिवार में जो घट सकता है वो वैसा  का वैसा दिखा पाते हैं । हमें तो हमारे नए सेंसर सदस्यों के कारण और पीछे धकेला जा रहा है । 


कहीं कहीं ऐसा लगता है कि काश आप कहानी का हिस्सा हो पाते और सब कुछ बिखरता हुआ देख किसी को समझा पाते कि यहीं रुको । अपनी सोच को बिखरने की दिशा में और आगे मत ले जाओ । आगे सब बहुत मुश्किल ही होगा।

उम्मीद करता हूँ हम भी फिल्मों में कहानी कहना शुरू कर पाएं !




प्रदीप अवस्थी, उत्तर प्रदेश के रामपुर के रहने वाले हैं, थिएटर से निकले हैं सो पक्के और गंभीर अभिनेता हैं..किताबों और ख़ुद के साथ ने अंदर के लेखक और कवि को भी बाहर ला खड़ा कर दिया है...अपनी कविताओं के लिए आजकल खूब चर्चा पा रहे हैं...पढ़िए इनका गद्य भी...प्रदीप ने वादा किया है कि Mean-मेख के लिए लिखते रहेंगे। इनका पता है https://www.facebook.com/pradeep.awasthi.khwab


इस फिल्म के बारे में अधिक जानकारी के लिए http://en.wikipedia.org/wiki/Force_Majeure_%28film%29 पर जाएं।



Monday, March 2, 2015

दो बीघा ज़मीन - "ज़मीन तो किसान की मां है हुज़ूर...भला कोई अपनी मां को बेचता है?"


मोतिहारी से मड़ियाहूं और दाहेगांव (विदर्भ) से दादरी तक खेतों और गलियों में धनगु महतो पागल हो कर फिर रहा है...उसका बेटा शम्भू महतो, अपनी पत्नी पार्वती और बेटे कन्हैया के साथ हथेली से गिरती मुट्ठी भर मिट्टी को माथे से लगा कर फूट-फूट कर रो रहा है, उसके घुटने इस लायक भी नहीं बचे हैं कि वह उठ कर किसी शहर में जाए और मजदूर बन जाए, किसी कोने में ठाकुर हरनाम खड़ा ठठा कर हंस रहा है और उसकी हंसी की गूंज देश के हर एक महानगर में किसी रिक्शा चलाने वाले, किसी भार ढोने वाले, किसी सब्ज़ी बेचने वाले और किसी फुटपाथ पर सो रहे न जाने कितने शम्भुओं की पुकारों में गूंजती है। पूरा देश जब दो बीघा ज़मीन बन जाए और उसकी बोली लगा कर, किसान को नीलाम किया जा रहा हो, ऐसे में हम सिवाय 1953 की इस फिल्म के अलावा क्या याद कर के, शहर में अपने घरों में आराम से बैठे होने को कोस सकते हैं कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं लेकिन सब देखते रहेंगे...जबकि किसी कोने में बैठा कोई बिमल रॉय इसको कागज़ पर उतारता रहेगा कि कभी फिर मौका मिले...तो फिर तारीख की शक्ल में मुस्तकबिल रच दे।
हर साल भूमि अधिग्रहण और इससे जुड़े क़ानून का शोर मचता है। हर साल हज़ारों किसानों की ज़मीन छीन कर, उन्हें ज़मीन के मालिक से, सड़क का मजदूर बनने को मजबूर कर दिया जाता है। हर साल लाखों लोग गांवों से पलायन कर के, शहर में काम की तलाश में आते हैं और जो नहीं आते हैं, उनकी खुदक़ुशी महज एक आंकड़े के तौर पर दर्ज हो जाती है। बचपन से भारत को एक कृषि प्रधान देश कहते आते, हम लोगों के लिए अब किसान की मौत सिर्फ एक संख्या है, जिससे हम अंदाज़ा लगा पाएं कि कितने किसानों ने आत्म हत्या की और उसके कारण को लेकर सुविधा के मुताबिक कयास लगा सकें। हम दरअसल अब असहज भी नहीं होते, लेकिन हैरानी की ही बात है कि आज से तकरीबन 61 साल पहले एक फिल्म निर्देशक, भविष्य देख पा रहा था और कलम को सेल्युलाइड पर उतार कर, इतिहास नहीं भविष्य पर्दे पर रच रहा था। 
1953 में बिमल रॉय की फिल्म दो बीघा ज़मीन अगर आप ने नहीं देखी है, तो अभी देखिए और समझिए कि किसान और ज़मीन का रिश्ता ही नहीं...उनकी ज़मीनों को छीन कर पूंजीपतियों को दे देने के बाद की स्थिति हम को कल कहां ले जा कर छोड़ेगी। इस फिल्म की कहानी दरअसल वही है, जो आज देश के हर किसान की कहानी है। कम ही होता होगा, जब कोई सिनेमा, भविष्य में जा कर इस कदर सच होता होगा, जिस तरह बिमल रॉय द्वारा लिखी और निर्देशित की गई, दो बीघा ज़मीन। 
फिल्म के बारे में बात करने का सबसे सही समय यही है और इसलिए ही नहीं कि देश में भूमि अधिग्रहण क़ानून अब यह तय करेगा कि किसान की ज़मीन दरअसल उसकी नहीं, किसी औद्योगिक घराने या फिर उसकी ही चुनी गई सरकार की मिल्कियत है, बल्कि इसलिए कि हमारी नई पीढ़ी न तो इस फिल्म के बारे में कुछ जानती है और न ही किसानों के आज के हालात के बारे में। इस फिल्म को ख़ुद बिमल रॉय ने ही लिखा था और निर्देशित किया था। फिल्म में बलराज साहनी ने एक उत्तर भारतीय किसान को ज़िंदा ही नहीं किया...जिया भी था। 
दो बीघा ज़मीन का नायक शम्भू महतो (बलराज साहनी), एक छोटे से दो बीघा ज़मीन के टुकड़े का मालिक है। उस पर वह खेती करता है और बारिश आते ही झूम कर नाचता और गाता है...वह मिट्टी को मां कह के पुकारता है और उम्मीद लगाए रहता है कि उसका 65 रुपए का कर्ज़, एक दिन उसकी मां, चुकता ही कर देगी। शम्भू का एक बूढ़ा पिता है, धनगु महतो (नाना पालसीकर)...एक बेटा है, कन्हैया (रतन कुमार) और पत्नी है पार्वती...(निरूपा राय), जिसे वह प्यार से पारो कह कर...नए गहनों का वादा कर, ज़मीन बचाने के लिए उसके पुराने गहने भी ले कर बेच आता है...
शम्भू की ज़मीन एक ऐसी ज़मीन के बीच में आ जाती है, जिस पर गांव का ज़मींदार हरनाम सिंह (मुराद), शहर की एक कम्पनी के साथ मिल कर फैक्ट्री लगाना चाहता है। ज़मींदार, शम्भू की ज़मीन खरीद लेना चाहता है लेकिन शम्भू, के इनकार करने पर वह उससे पुराना कर्ज़ चुकाने को कहता है। 65 रुपए का कर्ज़, सिर्फ कलम के थोड़े से खेल से...235 रुपए हो जाता है। एक छोटे किसान के लिए यह रकम बहुत बड़ी है। मामला, अदालत में जाता है और अदालत यह रकम चुकाने के लिए मियाद तय कर देती है। अपनी ही ज़मीन पर खेती करने में अक्षम, शम्भू...कोलकाता पलायन करता है और साथ में जाता है, उसका बेटा कन्हैया। ज़मीन का मालिक अंततः कोलकाता में हाथ रिक्शा मजदूर बन जाता है....बिना कहानी सुनाए, सिर्फ यह जान लीजिए कि शम्भू आखिरकार गांव पहुंचता है, अपने पिता को पागल हो कर, गांव की गलियों में भटकता पाता है और कम से कम मां के ठीक होने की आस में ही खेतों की ओर भागता है, जहां एक फैक्ट्री लग चुकी होती है। लेकिन सिर्फ इतना ही तो दुख नहीं होता है...भारतीय किसान की ज़िंदगी सिर्फ इतने से दुख से पूरी ही नहीं हो सकती और अपनी ज़मीन की मिट्टी उठा कर, माथे से लगाते शम्भू से वह अंजुरि भर मिट्टी भी छीन ली जाती है...क्या आप उस दर्द को महसूस कर सकते हैं, ज़ाहिर है मेरे लिखने से नहीं कर सकते, इसलिए यह फिल्म देखिए। 
दरअसल कला, नाटक, सिनेमा किसी की भी शुरुआत से यक्ष प्रश्न और बहस यही रही है, कि सिनेमा किनकी कहानी कहेगा...कौन सी कहानी कहेगा...कैसे कहेगा और क्यों कहेगा कोई विशेष कहानी...सिनेमा...दो बीघा ज़मीन को देख कर यह समझा जा सकता है कि वह कौन सी कहानियां हैं, जो हमारे समय में बिल्कुल नहीं कही जा रही हैं और फिर इस रास्ते पर धीरे-धीरे चल कर यह भी समझा जा सकता है कि वह कहानियां आखिर क्यों नहीं कही जा रही हैं। 
इस फिल्म में बलराज साहनी ने शम्भू के किरदार को जिस तरह निभाया है, उसके बारे में बहुत से किस्से हैं, लेकिन दरअसल आज के वक्त में सबसे अहम वह बात है, जो यह फिल्म कहना चाहती थी। जिसे बलराज साहनी की ज़ुबान से बिमल रॉय ने कितनी ही बार इस फिल्म में कहलवाया...

"ज़मीन तो किसान की मां है हुज़ूर...भला कोई अपनी मां को बेचता है?"

वह कौन सा सच्चा डर है, जिसके चलते हर पारो, हर शम्भू से कह उठती है..."मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी...शहर अच्छी जगह नही!" और हर शम्भू की वह कौन सी मजबूरी है कि वह, "जाना ही पड़ेगा..." कह कर शहर चल देता है? और जब वह कोलकाता की सड़कों पर हाथ रिक्शा दौड़ा रहा होता है, उसका बूढ़ा बाप धनगु महतो, अपनी बहू पारो के गहरे पानी में घुस कर सिघाड़े तोड़ लाने पर न जाने किस विरसे में मिले दर्द के कह उठता है, 
"हम गरीबों के पास और है भी क्या...अगर यह पापी पेट भी न हो..."

जिस वक्त बिमल रॉय ने यह फिल्म लिखी, उस समय भूमि अधिग्रहण को लेकर कोई क़ानून नहीं था। उस वक्त उदारीकरण और विनिवेश की आंधी नहीं आई हुई थी। उस वक्त पूंजीपति, सरकार नहीं चलाया करते थे। लेकिन बिमल रॉय देख पा रहे थे कि इस मुल्क में आगे क्या होना है। बिमल राय का शम्भू लगातार 70 दिनों तक रिक्शे पर अपने जैसे ही दिखने वाले लोगों को खींच कर भी आखिरकार अपनी ज़मीन वापस हासिल नहीं कर पाता है। उस पर आग उगलती एक इमारत खड़ी होती है और शम्भू रोता हुआ लौट जाता है...कहां, शहर की ओर...शहर जो दरअसल अच्छी जगह नहीं है...जो दरअसल इतनी खराब जगह है कि वह गांव तक जा पहुंचता है और उसे भी निगल जाता है।

नया दौर में दिलीप कुमार का एक संवाद है..."बाबू, लड़ाई शहर और गांव की नहीं,...लड़ाई मशीन और हाथ की है..." कौन सा वह निजाम और लोकतंत्र है, जो हाथ ही काट देने पर आमादा है?
दो बीघा ज़मीन को देखते वक़्त बस सब कुछ आज के वक्त के हिसाब से रखते चलिएगा...आपको अपने आस पास न जाने कितने शम्भू रिक्शा चलाते और मजदूरी करते दिखेंगे...न जाने कितने कन्हैया, रेलवे स्टेशनों और बस स्टॉपों पर बूट पॉलिश करते मिल जाएंगे, न जाने कितनी पारो, सिर पर ईंट लिए इमारतें बनाती दिखेंगी और घर लौट कर जब आप आईना देखेंगे तो आपकी आंखों में से अचानक बूढ़ा पागल धनगु महतो चीख उठेगा...कि शम्भू और धनगु महतो, दरअसल गोदान के होरी महतो ही हैं, जो कभी दो बीघा ज़मीन में रिक्शा खींचते औऱ गरीबी झेलते पागल हो जाते हैं, तो कभी पीपली लाइव में अपनी ही कब्र से मिट्टी खोदते, उसी में सो जाते हैं। 
आप को अगर शम्भू न दिखाई दे, तो अपने आप को दोष मत दीजिएगा...दोष दरअसल हम सबका है, जो शहरों में एक ऐसा समाज बनाते हैं, जो न तो किसी के छप्पर में हाथ लगाता है, न ही हुक्का बांटता है, न ही घर आए अजनबी को भी पानी, गुड़ के साथ ही देता है...हम सब उस पाप के भागीदार हैं, जिसके शिकार विदर्भ से वाराणसी तक के किसान, बुनकर और ग्रामीण हैं...क्योंकि हमारे बिजली, इलाज, बिस्किट और दवाओं के लिए उनकी ज़मीनें छीन कर उनको शहर भेज दिया जाता है और 1953 का शम्भू, 2010 का नत्था बन जाता है। 
मुझे पूरा यकीन है कि दो बीघा ज़मीन आपको थोड़ा सा वह समझा पाएगी, जो सरकार आपको बताना नहीं चाहती...लेकिन मुझे यह भी यक़ीन है कि जब तक आप पूरा समझ पाएंगे...तब तक इस मुल्क के सारे शम्भू, रिक्शा खींचते-खींचते अपनी एक मुट्ठी मिट्टी भी गंवा देंगे...हर पारो का एक-एक गहना बिक जाएगा...हर कन्हैया बूट पॉलिश करने से लेकर गांजा बेचना सीख चुका होगा...और हर धनगु महतो पागल हो कर, आपके घर के बाहर आपका इंतज़ार कर रहा होगा...घर से मत निकलिएगा, क्योंकि आपकी दो बीघा ज़मीन तो कहीं थी ही नहीं...और जिसके पास थी, वो उसे हासिल करने के लिए कुछ भी करेगा...

फिल्म न मिले, तो यू ट्यूब के इस लिंक पर पूरी फिल्म देखी जा सकती है...

और यह गाना ज़रूर सुनें...


Mayank Saxena
मयंक सक्सेना

 लेखक अतीत में रेडियो और टीवी के पत्रकार रहे हैं, फिलहाल स्वतंत्र लेखन और अनुवाद करते हैं। फिल्मों के कीड़े हैं और व्यंग्य लेखन की कोशिशें करते रहते हैं।
Writer has been a TV-Radio Journalist but now is a freelance writer and translator. Pretends to be a satirist and indeed is a Cinema Worm!
Can be contacted at - mailmayanksaxena@gmail.com

Sunday, March 1, 2015

(Oscar Special) बर्डमैन, ख्याति और प्रतिष्ठा की मरीचिका की कहानी है - रॉबी कॉलिन

यह मूल लेख ब्रिटिश अंग्रेज़ी अख़बार The Telegraph से साभार लिया गया है। इस फिल्म समीक्षा को पढ़ कर आप एक और आयाम समझ सकते हैं, इस शानदार फिल्म का, इसका हिंदी अनुवाद डिमांड और सप्लाई का मामला रहेगा, मतलब ये कि यदि आप मांग करेंगे तो प्रस्तुत किया जाएगा। फिलहाल ये समीक्षा पढ़ें, जो आपके-हमारे अंदर के सुपरहीरो की बात करती है...बर्डमैन अंदाज़ में..
Almost the first thing we see in Birdman, the new film from Alejandro González Iñárritu, is a faded Hollywood star named Riggan Thomson (Michael Keaton) meditating in his dressing room. What’s unusual about the shot, apart from the fact that Riggan is hovering a clear three feet above the floorboards, is that from that moment until 10-or-so minutes from the end of the movie, the camera doesn’t so much as blink.
The vast majority of Iñárritu’s hilarious, beautiful, film-defying film plays out in an apparently continuous, cut-free sequence that prowls through the St James Theatre in New York City, where Riggan hopes to resuscitate his flagging career.

We’ve seen the long-take trick before, perhaps most notably in Hitchcock’s 1948 chamber thriller Rope, which masked five of its 10 cuts by slinking in close to its cast. But in Birdman, the effect’s entirely different. Working with the great cinematographer Emmanuel Lubezki, Iñárritu turns the film into a high-wire act – live, unpredictable, light as air, yet also fatalistically locked on course. While it’s going on, you’re glued to the impossibility of what you’re seeing. Once it’s over, you can’t believe what you saw.

Yet Birdman isn’t a piece of empty showmanship. It’s a piece about empty showmanship, and its unhinged premise – a fairground-mirror image of the career of its leading man, who starred in Tim Burton’s two mega-grossing Batman films then quit the franchise on principle – couldn’t have been told in a smarter way.

Riggan is a casualty of film: two decades ago, he bailed from the smash-hit Birdman superhero franchise between its third and fourth instalments, but his enormous fan-base didn’t follow. Now, the only thing that can save his ego is acclaim, which is why he’s on Broadway, starring in and directing a play he’s adapted from a Raymond Carver short story. 

But as the show crunches through its disastrous previews and towards opening night, reality springs a leak. In floods the psychological turmoil of the Carver story and also blockbuster carnage: giant, robotic crows peck at skyscrapers, while military aircraft strafe the Broadway crowds. 

And hovering over it all is the spectre of Birdman himself – normally invisible, but sometimes glimpsed in his beaked mask and feathered cape – dripping poison in Riggan’s ear, like a malevolent Jiminy Cricket.

Riggan’s mania is fuelled by the seductions of fame and prestige, and how the two are, ultimately, nothing alike: “You’re not an actor, you’re a celebrity,” sneers Lindsay Duncan’s toxic theatre critic when Riggan buttonholes her after a disastrous preview night. But it’s also a film about faces, and the way in which all of us start to crumble the moment our masks drop.

There’s a scene in which Riggan’s fresh-from-rehab daughter (a superb Emma Stone) punctures her father’s pretensions with a monologue that’s delivered like a knitting needle to the gut. But while the words are furious, it’s the involuntary wince of sadness that flashes across her features in the silence that follows that makes us feel their point.

Keaton gives, in at least two senses, the performance of his career. He summons up all the manic comic energy of his early work in films like Night Shift and Beetlejuice, but Riggan seems half-fried by it, and as the heat increases on all sides, you can almost smell the sizzle. And he could hardly be better supported: Edward Norton is uproarious as his preening, co-star; Naomi Watts and Andrea Riseborough perfect as actresses jangled by insecurities; Zach Galifianakis tamped-down and terse as Riggan’s bumptious producer; Stone tremendous as the lone voice of reason, faltering and defiant.

This is grand, spectacular, star-powered cinema – a cosmological blockbuster – that makes us ask again what cinema can do and be. Call it a Dark Knight of the soul.

Robbie Collin मशहूर ब्रिटिश फिल्म समीक्षक हैं, जो पहले रूपर्ट मर्डोक के अख़बार द न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड में नियमित स्तंभ लिखते थे और अब उस अख़बार के बंद होने के बाद से द टेलीग्राफ के मुख्य फिल्म समीक्षक हैं। 
लेख का मूल स्रोत - http://www.telegraph.co.uk/film/birdman/review/

किसी ने कहा था...

Photography is truth. The cinema is truth twenty-four times per second.
फोटोग्राफी सत्य है। सिनेमा, सच के 24 फ्रेम प्रति सेकेंड हैं।
जीन-लुक गोदार्द