BBO - Blog Box Office

Monday, February 23, 2015

और ये रहे 83वे ऑस्कर (अकादमी) अवॉर्ड्स... (1) Theory of Best Acting in Lead Role...

हमारी पीढ़ी ने स्टीफ़न हॉकिंग को न केवल देखा है, बल्कि सुना और पढ़ा भी है और हम हैरान होते रहे कि कैसे ALM यानी कि Amyotrophic Lateral Sclerosis से ग्रस्त एक शख्स, जो न बोल सकता है, न चल सकता है बल्कि शरीर के ज़्यादातर हिस्सों से लाचार है...वह ब्रह्मांड के सबसे गहरे रहस्य एक के बाद एक सुलझाता जा रहा है। लेकिन हम ने स्टीफन हॉकिंग को हमारे वक़्त में देखा, वह वक़्त जब वो विशेष रूप से बनाई गई डिजिटल व्हील चेयर और वॉइस एड के सहारे हम से बात करने लगे थे और हम उन्हें देख कर हैरान हो रहे थे। हम में से कुछ ने उनकी उस से पहले की ज़िंदगी के बारे में उनकी पूर्व पत्नी जेन वाइल्ड हॉकिंग के संस्मरण के बारे में जान कर शायद ढेर सारे शब्द चित्रों को अपनी कल्पनाओं में आकार दिया होगा। लेकिन दरअसल वह काफी नहीं था, क्योंकि हमारी दुनिया को उसके सबसे गहरे रहस्यों के प्रवेश द्वार पर ला कर खड़ा कर देने वाले इस महानतम वैज्ञानिक को जानना बहुत ज़रूरी था। और फिर साल 2014 में 7 सितम्बर को टोरंटो में दुनिया के सामने आई, स्टीफन हॉकिंग की ज़िंदगी के पीले पन्नों और जवानी में ही गंभीर तंत्रिका रोग से ग्रस्त हो, चलने-फिरने, यहां तक कि बोलने से भी मोहताज हो जाने वाले शख्स की जिजीविषा, जीवन, प्रेम और संघर्ष के साथ सफलता की कहानी। एक ऐसी कहानी, जो असली से भी ज़्यादा असली थी। हालांकि पहली बार इस फिल्म को देखते हुए, मेरे मन में एक औसत सा भाव था, कि चलो ठीक फिल्म है। लेकिन एक रात बिस्तर पर लेटे हुए, मैं सोचने लगा कि आखिर इस फिल्म को मैंमे बेमन से ही देखा था, एक बार और देखते हैं...और दोबारा फिल्म देखते समय मुझे अहसास हुआ कि कैसे कई बार निर्देशन औसत होने पर भी एक अभिनेता सिर्फ अपने कंधों पर रख कर पूरी फिल्म को एक जीवन में बदल देता है। 
स्टीफन हॉकिंग के किरदार में एडी
निश्चित रूप से चूंकि अब जब एडी रेडमायन के हाथ में अकादमी पुरस्कार की ट्रॉफी है, तो उनको वह श्रेय मिलना चाहिए जिसके वह हक़दार हैं, उन पर बात होनी चाहिए कि आखिर कैसे उन्होंने स्टीफन हॉकिंग की यह भूमिका इस कदर जीवंत कर दी कि स्टीफन हॉकिंग को इस फिल्म के लिए अपनी सिंथेसाइज़्ड आवाज़ देने के लिए मजबूर होना पड़ा। ये एडी की अदाकारी का ही कमाल था कि इस फिल्म को देख कर हॉकिंग भी अपने पुराने वक़्त में खो गए। फिल्म की कहानी एक कैम्ब्रिज के एक युवा शोधकर्ता के इर्द गिर्द घूमती है, जो आगे जा कर अपने अहम शोध के ठीक वक़्त अपने स्नायु तंत्र पर नियंत्रण ही खो बैठता है। डॉक्टर बताते हैं कि अब धीरे-धीरे उसका शरीर उसके काबू से बाहर हो जाएगा और एक-एक कर के सारे अंग शिथिल होते जाएंगे। उसके रोगग्रस्त शरीर और स्वस्थतम मस्तिष्क का पहले उसकी प्रेमिका से विवाह होता है और बाद में अकेलेपन के के वक्त वह फिर से अपना जीवनसाथी चुनता है...अपनी नर्स को...इस संस्मरण को हॉकिंग की पहली पत्नी ने ही लिखा है। आप अगर सिर्फ मनोरंजन ढूंढने जाएंगे तो फिल्म से आप निराश हो जाएंगे लेकिन अगर आप एडी रेडमायन को देखेंगे, आप उनके फिल्म के हर दृश्य के साथ बदलती भंगिमा को देखेंगे, उनके चेहरे के भाव देखेंगे और देखेंगे उनकी आंखों को कि एक वैज्ञानिक जो दुनिया के सबसे बड़े सिद्धांत को प्रतिपादित करने में जुटा है, वह कैसे अपने मस्तिष्क के भी काम करना बंद कर देने से पहले सिर्फ ये जानना चाहता है कि उसकी वैज्ञानिक मान्यता सच है या नहीं और अंततः वह अपने आप को सिद्ध करता है। 
फिल्म - द थ्योरी ऑफ़ एवरीथिंग
इस फिल्म में स्टीफन हॉकिंग के सिद्धांत नहीं, उस शख्स को आवाज़ दे दी गई है, जो हर तरह से हार मान लेने को अभिशप्त हो चला था लेकिन फिर भी उसने अपने और दुनिया के लिए वह हासिल किया, जो उसे करना था। एडी रेडमायन फिल्म के मध्य तक आते-आते, साबित कर देते हैं कि 33 साल के इस युवा के लिए अभिनय केवल अभिनय करना नहीं है, किरदार को इस गंभीरता से जीना है, जिस गंभीरता से शायद वह अपना जीवन भी नहीं जी रहा है। दरअसल अभिनय का मूल यही है कि किरदार के सुख-दुख और आकांक्षाओं को अनुभव कर लेना...उसे संवाद से कम और भावों से अधिक अभिव्यक्त करना और शायद हमारी फिल्मों में अभी भी यह लक्ष्य हासिल करना बाकी रह गया है। 
अकादमी पुरस्कार के साथ एडी रेडमायन
इस पुरस्कार के लिए एडी का बर्डमैन के माइकल कीटन और फॉक्स कैचर के स्टीव कैरेल से था। माइकल कीटन के अभिनय की तो हर ओर तारीफ हो ही रही है, लेकिन फॉक्स कैचर में अभी तक एक स्टैंड अप कॉमिक के तौर पर जाने जाते रहे स्टीव कैरेल ने शायद हॉलीवुड के इतिहास का सबसे मुश्किल गंभीर किरदार निभाया है। ख़ैर मेरी पसंद स्टीव कैरेल ही थे, लेकिन एडी के काम से इनकार करना भी अन्याय ही होगा। 

एडी रेडमायन ने करियर की शुरुआत थिएटर से की, वह भी शेक्सपियर द्वारा स्थापित किए गए ग्लोब थिएटर से और थिएटर अभिनेता के तौर पर न जाने कि कितने पुरस्कार हासिल किए। ज़ाहिर है कि अभिनय का यह मूल सबक उनको थिएटर से मिला है। यह फिल्म देखना ज़रूरी है...स्टीफन हॉकिंग के लिए...हमारी दुनिया के लिए...और यह जानने के लिए कि अगर अभिनय वाकई कोई कला है तो उसे उत्कृष्टता तक पहुंचाना, किस प्रकार एक अहम इंसानी उपलब्धि है और दुनिया को कला और विज्ञान कैसे बदल सकते हैं इसलिए भी...इस फिल्म को देख कर समझिए कि खून बहाती दुनिया के बीच, क्या है जो सार्थक है और अगर कला न होती, तो मानवता का क्या होता...और विज्ञान न होता...तो कलाएं कब की ख़त्म हो जाती...फिलहाल एडी रेडमायन को मुबारकबाद और साथ ही यह भी..."दोस्त, आप ने शानदार काम किया...लेकिन मैं जानता हूं कि आखिर तक आप को कीटन और कैरेल से डर लगता रहा होगा...आपकी खुशी और हंसी से यह साफ था...!"

लेख - मयंक सक्सेना

लेखक अतीत में रेडियो और टीवी के पत्रकार रहे हैं, फिलहाल स्वतंत्र लेखन और अनुवाद करते हैं। फिल्मों के कीड़े हैं और व्यंग्य लेखन की कोशिशें करते रहते हैं। 
Writer has been a TV-Radio Journalist but now is a freelance writer and translator. Pretends to be a satirist and indeed is a Cinema Worm! 
Can be contacted at - mailmayanksaxena@gmail.com



    

No comments:

Post a Comment

किसी ने कहा था...

Photography is truth. The cinema is truth twenty-four times per second.
फोटोग्राफी सत्य है। सिनेमा, सच के 24 फ्रेम प्रति सेकेंड हैं।
जीन-लुक गोदार्द