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Tuesday, April 28, 2015

क़िस्सा - इस फ़िल्म के कैमेरे पर इतनी कालिख किसने छिड़क दी...

(एक रोज़ प्रदीप से फिल्म क़िस्सा पर बात हुई और लम्बी बात होने के कई दिन बाद उन्होंने ये लेख भेजा...इसको व्यस्तता के चलते अब प्रकाशित कर पा रहा हूं...लेकिन इसको एक अहम टिप्पणी मानिए और जो इस फिल्म के अंत और आदि को लेकर अभी तक आश्वस्त न हों, एक बार इसको पढ़ें - मॉडरेटर)


 र्ज़ कीजिए कि दिल्ली और मुंबई या किसी भी बड़े शहर में जहाँ हम रहते है ,कोई कानून व्यवस्था न बचे और अपनी लड़ाई हथियारों से खुद ही लड़नी पड़े । किसी पड़ोसी शहर या मुल्क के हमले के डर से हमें अपना घर छोड़ कर भागना पड़े और इतना भी समय ना हो कि ज़रूरी सामान ही बटोर सकें । झुंडों में लोग एक दूसरे से लड़ते-झगड़ते,गिरते पड़ते निकल पड़ें ।थोड़ा ग़ौर से सोचिए । चल तो दें लेकिन पहुँचना कहाँ हैं ,यह  ना पता हो। रास्ते में लोगों की संख्या कम होती जाए । कौन कहाँ कब कट गया ,किसका बलात्कार हो गया ,किसे कौन से नाले में फ़ेंक दिया गया,कौन पागल हो गया,कुछ पता ही ना लगे । इस बात पर कितना भी ज़ोर डाल कर सोचा जाए ,सोच नहीं पाएँगे ,क्योंकि हमारे पास सोचने का समय नहीं है । हमें झण्डा फहराना है,लड्डू खाने है,और पड़ोसी मुल्क को गाली देनी है । यही सिखाया गया है और ख़बरदार जो इसके आगे कुछ भी कहा ।

जो दिन आपको आज़ादी का दिन लगता है,मुझे विभाजन और विस्थापन का दिन लगता है ।  

तो ऐसे ही समय में अम्बर सिंह (इरफ़ान) को अपनी पत्नी और तीन बेटियों के साथ अपना घर छोड़ना पड़ता है। वह कैसी परिस्थितियाँ होंगी जब गाँव की औरतों को पड़ोसी गाँव (जो अब दुसरे मुल्क़ का हिस्सा है )  के हमले के डर से रात में अपना गाँव छोड़ कर जाना पड़े और किसी एक औरत को ऐसे ही डर और मनहूसियत के बीच बच्चा पैदा करना पड़े । रात है । जंगल है । एक औरत  ऐसी स्थिति में बच्चा जनती है ।

ऐसी बहुत सी कहानियों में यदि आपको देश की आज़ादी दिखती है और विभाजन की त्रासदी नहीं,तो इसमें दोष इस बात का है कि हमें बचपन से क्या रटाया गया है । इन्हीं परिस्थितियों में मेहर (टिस्का )जो अम्बर सिंह की पत्नी है ,बेटी को जन्म देती है जो की तीसरी है ।


वह कैसी सनक होगी जब चौथी दफ़े भी बेटी होगी और उसे बेटे की तरह पाला जाएगा । 

जब एक बच्चा जन्म लेता है,तब कैसे पहचान की जाती है कि वह लड़का है या लड़की और ऐसे में कोई वहाँ तक बिना पहुँचे फैसला कर ले कि बच्चे को उम्र भर प्रकृति के नियम के विरुद्ध पाला जाएगा ।वह कैसी सनक होगी।

एक लड़की जिससे उसका लड़की होना छीन लिया गया । एक पिता जो जीवन भर अपने बनाए झूठ और सनक में जीता रहा और एक माँ जिसकी आत्मा को चुप रहना छीलता रहा और वह छिलती रही ।

एक बच्ची का लड़की होना तो छुपाया जा सकता है लेकिन एक वयस्क का स्त्री होना नहीं । एक उम्र में कपड़ों पर ख़ून का रँग उतरना शुरू होता है । कपड़ों को हज़ारों लाखों बार जलाया जा सकता है लेकिन देह अपना रँग नहीं जला सकती । 

फिर अपने जुनून और पागलपन को बचाए रखने के लिए दो ज़िंदगियों को ऐसी आग में झोंक देना जिसे बुझाने के लिए अभी कोई पानी नहीं बना । एक समय के बाद यह ऐसा बोझ बन जाता है जिसे लादना,सब कुछ भस्म हो जाने से बचाने के लिए ज़रूरी है ।

कुँवर (तिलोत्तमा) का क़िरदार जितना जटिल है,उसे उतनी ही बारीक़ी से निभाया गया है । जब वह अपनी माँ के पास बैठ कर उससे बात करना चाहती थी ,उसे क़सरत कराने के लिए एक पहलवान लाया गया । जब वह अपनी बहनों के साथ गाने गाते हुए लोहड़ी माँगने गली-गली चहकना चाहती थी उसे बन्दूक थमा दी गई और शिकार करना सिखाया गया । एक झूठ जिसे सब जीना शुरू करते हैं और फिर उम्र भर उसके पीछे छिपे सच को नकारते हैं । वहीं दूसरी और नीली(रसिका) जो यह पता लगने पर कि उसे एक स्त्री से प्रेम हुआ है,हँस रही है या रो रही है पता नहीं चलता ।

पूरी फ़िल्म अपने साथ एक स्याह रँग ले कर चलती है । 

अंत में ये सारा समाज,यह सारी पुत्र की इच्छाएं, दो स्त्रियों को एक हवेली में बंद हो कर रहने के लिए मजबूर कर देती हैं । यहाँ एक स्त्री ही दूसरी स्त्री की देह में छुपे झूठ की मुक्ति का ज़रिया बनती है ।

एक जगह कुँवर (तिलोत्तमा) का कहना है -”मैं जब वो कपड़े पहनती हूँ तो ऐसा लगता है कि सारे शरीर में बिच्छू रेंग रहे हैं । कुछ समझ नहीं आता कि मैं कौन हूँ । “

निर्देशक अनूप सिंह ने जादुई यथार्थवाद का सहारा लिया है जहाँ यह आज़ादी है कि आप फ़िल्म का कौन सा सिर पकड़ कर आगे चलते हैं । अंत में कौन मर चुका है या कौन ज़िन्दा है,इससे ज़रूरी यह हो जाता है कि पितृसत्ता बरक़रार है । पितृसत्ता का सीधा सम्बन्ध ताक़त से है । जिसके पास ताक़त होगी,एकाधिकार होगा ,उसका निरंकुश हो जाना लगभग तय है,फिर वह चाहे पुरुष हो या स्त्री । और जो भी इसके ख़िलाफ़ बोलेंगे,वे सँख्या में चंद होंगे और उन्हें कटघरे में खड़ा किया जाता रहेगा ।

“बचपन से आग पालेंगे,तो घर तो जलेंगे ही । आप की दी हुई बन्दूकों से वे एक दिन आप को ही गोली मारेंगे । जब इंसान,जानवर की ज़िन्दगी जीना तय कर लेता है तो उसकी हर मुश्किल का हल और खौफनाक होता जाता है । रेगिस्तान में जहाँ पानी होगा,उसे अशुभ माना जाए । नीलियों को छत की मुँडेरी पर बैठकर आँगन में गिर जाना होगा,उसी आँगन में जहाँ एक कूँए में लाश फेंकी जाती है ।” 

जब उन्हें साबित करना होगा अपना स्त्री होना,तब क्या उनके पास यही आख़िरी विकल्प छोड़ा जाएगा कि अपनी नंगी छातियाँ दिखा दी जाएँ । तब तक क्या इसी ख़ुद के रचे फ़रेब के संसार में कुछ और बन कर जीना पड़ेगा ।

बैकग्राउंड म्यूज़िक शुरुआत से ही फिल्म में ऐसी मनहूसियत भर देता है जैसा कि अम्बर सिंह का किरदार है । फ़िल्म की पृष्ठभूमि पंजाब की है ।

और मैं यह सोचता हूँ कि
“इस फ़िल्म के कैमेरे पर इतनी कालिख किसने छिड़क दी ।” 

प्रदीप अवस्थी मूलतः थिएटर औऱ फिल्म अभिनेता हैं...मुंबई में रहते हैं...रामपुर के रहने वाले हैं...और कमाल की कविताएं लिखते हैं...कम लिखने और बहुत सोचने वाले आदमी हैं...आप इनसे ही मिलने जाएं तो हो सकता है कि कई घंटे इनके सामने बैठे रहें...इनसे बात भी न हो और आप लौट आएं...प्रदीप खूब फिल्में देखते हैं और भाया तो उस पर लिखते भी हैं...प्रदीप मीन-मेख के सक्रिय लेखक हैं...
सम्पर्क करें....
https://www.facebook.com/pradeep.awasthi.khwab

Wednesday, April 15, 2015

जिसे दुनिया मनमोहन देसाई कहती है!

मनमोहन देसाई
किसे ख़बर थी कि हिंदी फ़िल्मों के इतिहास में 70 और 80 के दशक का सबसे चमकता हुआ चेहरा—जो हमेशा परदे के पीछे अपना वक़्त बुनता रहा—इस तरह ज़िंदगी से उकता जाएगा? हज़ारों नामों को ज़िंदगी और हज़ारों ज़िंदगियों को नाम बख़्शने वाला शख़्स—एक दिन ख़ुद गुमनामी के गंदे पानी में गर्क़ हो जाएगा? जिसकी सुलगती हुई साँसें महज मज़ाक बन कर रह जाएंगी और जिसके कारनामे लोगों के ज़ेहन में कतराती हुई कतरनें पैदा करती रहेंगी। वो कहते है न! कि कामयाबी अपना क़ीमत वसूल करती है। सच ही कहते हैं। 1 मार्च 1994 को उसकी ज़िंदगी ने इस बात पर मुहर लगा दी। सिनेमा, जिसे ‘लार्जर देन लाइफ़’ की वजह से हम अक्सर ‘सफ़ेद झूठ’ भी कहते हैं—का दूसरा पहलू यानि सिनेमा का सियाह सच! जहाँ एक ओर कैमरे के आगे मुस्कुराते हुए चेहरे ‘मैग्नेटिक’ जान पड़ते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हीं चेहरों का टूटता हुआ क्वाँरापन हमारी नींदें धज्जियाँ करने के लिए काफी होता है। मैं बात कर रहा हूँ उस शख़्स की, जिसे दुनिया मनमोहन देसाई कहती है।
मशहूर फ़िल्मकार मनमोहन देसाई—जिसकी दिमाग़ी उपज को फ़िल्म समीक्षकों ने महज ‘मसाला फ़िल्म’ कहकर पुकारा—कहना ग़लत न होगा कि वह समय और समाज की नीली नसों में अपनी रचनात्मकता का लहू भर कर हिंदी फ़िल्मों के दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर देता था। वह जानता था कि लोग क्या चाहते हैं? उसे मालूम था कि आम आदमी की मानसिकता किस मुहाने पर आकर नाच उठती है? उसे पता था कि चीज़ों का इस्तेमाल कैसे किया जाता है? चीज़ें, चाहे फिर लोगों की ‘सेंटीमेंट’ से ही जुड़ी हुई क्यों न हो? यही वजह है कि उसकी फ़िल्मों के दीवानों में हर वर्ग के लोग शामिल हैं—क्या ख़ास, क्या आम! हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा को नई दिशा दिखाने वाले मनमोहन देसाई की सबसे चर्चित फ़िल्म ‘अमर, अकबर, एंथनी’ की बात करें, तो ‘बिछड़ने और दोबारा मिलने’ के फॉर्मूले पर बनी यह फ़िल्म बेहद कामयाब हुई। यह बात ग़ौर करने जैसी है कि अपने दर्शकों के सामने सिनेमा स्क्रीन पर एक पूरी दुनिया रचने वाले मनमोहन देसाई की फ़िल्म के इस फॉर्मूले से प्रेरित होकर अन्य फ़िल्मकारों ने भी कई फ़िल्में बनाईं।
बताता चलूँ कि 1943 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘किस्मत’, जिसमें अशोक कुमार हीरो थे और बाद में राज कपूर स्टारर ‘आवारा’ में ‘बिछुड़ने-मिलने’ के थीम को भूनाने की कोशिश की गई थी। कोशिश तो कामयाब नहीं हुई, मगर मनमोहन देसाई ने इसी थीम का उपयोग अपनी फ़िल्मों के लिए किया। 40 के दशक की अंधी थीम, 70 और 80 के दशक में आँख बनकर उभरी। मनमोहन देसाई ने अपने तीस साल लंबे फिल्मी करियर में 20 फिल्में बनार्ईं, जिनमें से 13 फिल्में सफल रहीं। फ़िल्म समीक्षकों का मानना है कि इतनी सफलता हिंदी फ़िल्मों के किसी दूसरे फ़िल्मकार को नहीं मिली। जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि 70 के दशक में मनमोहन देसाई की फ़िल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा रखा था। फ़िल्मों के लिए सबसे कामयाब साल 1977 रहा। उस साल उनकी चार फिल्में ‘परवरिश’, ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘चाचा भतीजा’ और ‘धरम-वीर’ प्रदर्शित हुईं और सारी सुपर हिट रहीं। पहली दो फ़िल्मों में अमिताभ बच्चन हीरो थे, जबकि बाद की दो फ़िल्मों में धर्मेद्र ने काम किया था।

मनमोहन देसाई, सच्चे मायनों में अपने समय के सम्पूर्ण और शुद्ध मनोरंजन परोसने वाले ऐसे फ़िल्मकार थे—जिन्होंने व्यावसायिकता को सामाजिकता के साथ घोल दिया--जिनकी फिल्मों में व्यावसायिकता को विस्तार मिला, तो हीरो की ‘इमेज’ को भी नया आयाम मिला। देसाई अपनी फ़िल्मों को लेकर काफी उत्साहित और सकारात्मक रहते थे। अमिताभ बच्चन ने एक दफ़ा अपने ब्लॉग पर लिखा भी था, “मनमोहन देसाई कलाकारों की ओर दर्शकों का ध्यान न होने पर बेहद नाराज हो जाते थे। वे, उस थिएटर में कभी नहीं जाते, जिसमें उनकी फिल्में चल रही हों। ऐसा नहीं था कि वे वहां जाना नहीं चाहते। दरअसल, उनके सहयोगी और स्टाफ वहां नहीं जाने देते। इसकी एक खास वजह थी। उनकी आदत थी कि उनकी फ़िल्मों की स्क्रीनिंग के दौरान कोई बात करे या हॉल के बाहर जाए, तो वे बेहद गुस्से के साथ या तो उसे चुप करा देते या फिर बिठा देते और बाहर नहीं जाने देते।"
कॉमर्शियल सिनेमा को नई रवानी और बुलंदी देने वाले मनमोहन देसाई को फ़िल्मी माहौल विरासत में मिला था। उनका जन्म 26 फरवरी 1936 को गुजरात के वलसाड शहर में हुआ था। पिता किक्कू देसाई फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े थे। वे पारामाउंट स्टूडियो के मालिक भी थे। घर में फिल्मी माहौल रहने के कारण मनमोहन देसाई का रूझान बचपन के दिनों से ही फ़िल्मों में था। बतौर निर्देशक मनमोहन देसाई की पहली फ़िल्म ‘छलिया’ 1960 में रिलीज हुई। यह बात और है कि राजकपूर और नूतन जैसे कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर रंग नहीं जमा सकी। हाँ, इतना ज़रूर हुआ कि फ़िल्म के गीत काफी लोकप्रिय हुए। इसके बाद मनमोहन देसाई ने अभिनेता शम्मी कपूर की ‘ब्लफ मास्टर’ और ‘बदतमीज’ को निर्देशित किया, लेकिन इस बार भी देसाई के हाथों में निराशा ही आई। यह असफलता तो महज भूमिका थी उस फ़िल्मकार के पैदा होने की, जिसे कामयाबी के नए-नए मुकाम हासिल करने थे।
हुआ यूँ कि 1964 में मनमोहन देसाई को फ़िल्म ‘राजकुमार’ निर्देशित करने का मौक़ा मिला। हीरो थे—शम्मी कपूर। इस बार मेहनत ने अपना रंग जमा ही लिया और फ़िल्म की सफलता ने देसाई को बतौर निर्देशक एक पहचान दी। फिर मनमोहन देसाई निर्देशित और 1970 में प्रदर्शित ‘सच्चा झूठा’ भी करियर के लिए अहम फ़िल्म साबित हुई। इस फ़िल्म के हीरो थे—उस जमाने के सुपर स्टार राजेश खन्ना। ‘सच्चा झूठा’ बॉक्स आफिस पर सुपरहिट रही। इसी बीच मनमोहन देसाई ने ‘भाई हो तो ऐसा’ (1972), ‘रामपुर का लक्ष्मण’ (1972), ‘आ गले लग जा’ (1973), और ‘रोटी’ जैसी फिल्मों का निर्देशन भी किया, जिसे दर्शको ने ख़ूब सराहा। 1977 में बनी फ़िल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ मनमोहन देसाई के करियर में न सिर्फ सबसे सफल फिल्म साबित हुई, बल्कि उसने अभिनेता अमिताभ बच्चन को ‘वन मैन इंडस्ट्री’ के रूप में भी स्थापित कर दिया।
इसी फ़िल्म के बारे में ज़िक्र करते हुए अमिताभ बच्चन ने एक दफ़ा कहा था कि संयोगों और अतार्किकताओं से भरी ये कहानी सिर्फ मनमोहन देसाई के दिमाग़ का फितूर है। आज भी हम उस फिल्म के पहले दृश्य को देखकर हँसते हैं। एक नली से तीनों भाइयों का खून सीधा माँ को चढ़ता हुआ दिखाया जाना एक ‘मेडीकल जोक’ है। इन सबके बावजूद कुछ है, जिसने देखने वाले से सीधा नाता जोड़ लिया। सारी अतार्किकतायें पीछे छूट गईं और कहानी अपना काम कर गई। एक बात याद दिलाने जैसी है कि मनमोहन देसाई की फ़िल्मों के गाने हमेशा से अच्छे होते हैं। इसी सिलसिले में फ़िल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ के सभी गाने सुपरहिट हुए, लेकिन फिल्म का एक गीत ‘हमको तुमसे हो गया है प्यार...’ कई मायनों में ख़ास है। एक तो यह कि इस गीत में पहली और आख़िरी दफ़ा लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, मुकेश, और किशोर कुमार ने एक साथ गाया था।
कुछ और बातें बताता चलूँ। ‘राजकुमार’ (1964) और ‘क़िस्मत’ (1968) की कहानी लिखने वाले मनमोहन देसाई ने 1981 में निर्मित फ़िल्म ‘नसीब’ जिसके एक गाने ‘जॉन जॉनी जर्नादन...’ में सितारों का जमघट लगा दिया था। यह अपनी तरह का पहला मौक़ा था, जब एक गाने में फिल्म इंडस्ट्री के कई बड़े कलाकार मौजूद थे। इसी गाने के तर्ज़ पर शाहरुख ख़ान की फ़िल्म ‘ओम शांति ओम’ में एक गाना फ़िल्माया गया है। मनमोहन देसाई के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘क़िस्मत’ का एक गाना है—‘कजरा मोहब्बत वाला, अंखियों में ऐसा डाला, कजरे ने ले ली मेरी जान, हाय! मैं तेरे क़ुर्बान’। कहा जाता है कि वे अभिनेता विश्वजीत की सुन्दरता से प्रभावित होकर उन्हें अपनी फ़िल्म के इस गीत में एक महिला किरदार के रूप में पेश किया था और गीत के बोलों को आवाज़ दी थी शमशाद बेगम ने। इस गीत को विश्वजीत के साथ नायिका बबीता के ऊपर फिल्माया गया था। बबीता के लिए आशा भोंसले की आवाज़ का इस्तेमाल किया गया था।
एक और क़िस्सा याद आता है। किसी पत्रिका में पढ़ी थी यह बात। बात 1963 की है। एक दफ़ा मनमोहन देसाई किसी सड़क से गुजर रहे थे। रास्ते में उन्होंने कुछ लोगों को ‘दही-हांडी’ करते देखा। सन्योगवश उन्हीं दिनों ‘ब्लफमास्टर’—जिसका स्क्रीनप्ले भी उन्होंने ही लिखा था—की शूटिंग चल रही थी। उन्होंने सोचा कि क्यों न फ़िल्म में इस तरह का कोई गीत डाला जाए? फिर क्या था, सारी कहानी ही बदल गई। बदलाव यह हुआ कि शम्मी कपूर को शायरा बानो के लिए कोई तोहफा खरीदना है। पास पैसे नहीं हैं। किसी से उन्होंने सुना कि ऊपर लटकी मटकी में 100 रुपए का नोट है। जो वहाँ तक पहुंचेगा और मटकी फोड़ लेगा, नोट उसी का। और इस तरह हिंदी फ़िल्मों में पहली बार ‘दही-हांडी’ दर्शाई गई। इसके बाद तो कई फ़िल्मों में ‘दही-हांडी’ की मस्ती दिखाई गई।
याद दिलाने की ज़रूरत नहीं कि 1983 में मनमोहन देसाई निर्देशित फ़िल्म ‘कुली’ प्रदर्शित हुई थी, जो हिंदी सिनेमा जगत के इतिहास में अपना नाम दर्ज़ करा गई। शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन को लगी चोट और उसके बाद देश के हर एक पूजा स्थलों में अमिताभ के ठीक होने की दुआएँ मांगना एक अजीब-ओ-ग़रीब बात लगती है, मगर सच यही है। पूरी तरह से स्वस्थ होने के बाद अमिताभ ने ‘कुली’ की शूटिग शुरू की और कहने की ज़रूरत नहीं कि फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई। कहा जाता है कि फ़िल्म-निर्माण के पहले फ़िल्म के अंत में अमिताभ बच्चन को मरना था, लेकिन बाद में फिल्म का अंत बदल दिया गया। 1985 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म ‘मर्द’ जो देसाई के करियर की अंतिम हिट फ़िल्म थी। फ़िल्म का एक डॉयलाग ‘मर्द को दर्द नही होता...’ उन दिनो सभी दर्शको की ज़ुबान पर चढ़ गया था। 1988 में ‘गंगा जमुना सरस्वती’ देसाई द्वारा निर्देशित आख़िरी फ़िल्म थी, जो कमजोर पटकथा के कारण बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पिट गई। इसके बाद भी उन्होंने ने अपने चहेते अभिनेता अमिताभ बच्चन को लेकर फ़िल्म ‘तूफ़ान’ का निर्माण किया, लेकिन इस बार भी फ़िल्म ‘तूफ़ान’ बॉक्स ऑफिस पर कोई ‘तूफ़ान’ नहीं ला सकी। फिर उसके बाद मनमोहन देसाई ने किसी फ़िल्म का निर्माण या निर्देशन नहीं किया। …और इस तरह एक फ़िल्मकार ने अपने करियर का ‘द एंड’ लिखा।

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त्रिपुरारी शर्मा
 लेखक मूलतः शायर हैं और फिल्मों के लिए फिलहाल मुंबई में लेखन कर हैं। कविता कोश से रेख्ता तक इनकी नज़्में और ग़ज़लें पढ़ी जा सकती हैं...और www.facebook.com/tripurariks पर सम्पर्क किया जा सकता है।














Monday, April 13, 2015

आई एम अ लर्नर...हंटर...आप चाहें या न चाहें, सिनेमा बदल रहा है...

आप ने हंटर तो देखी ही होगी...क्या कहा? नहीं देखी...तो साहब और साहिबा, देख लीजिए। मार्च 2015 में रिलीज़ हंटर पर ये इला जोशी की एक टिप्पणी है...फिल्म में क्राफ्ट की कुछ दिक्कतों के बावजूद मैंने भी फिल्म को इंज्वाय किया और उसके गहन निहितार्थ को भी पाया...फिल्म पर इस टिप्पणी से सहमति के साथ इसे प्रकाशित किया जा रहा है...हालांकि हम असहमति के बावजूद भी प्रकाशित करते हैं...मूल टिप्पणी अंग्रेज़ी में है...यहां भी वही है...



As the name may suggest Hunterrr can be perceived to be a movie for boys/men but trust me being a woman too I would recommend it to as many people as I can. It's a must watch movie and am hell sure that all of us including me or you can easily relate to at least a couple of experiences they have brought to life on screen. A movie which makes you burst into hilarious fits of laughter, shows a different kind and levels of friendship, lets you to set your imagination free, makes you cry, makes you discuss the fun, pleasure and consequences of love, sex and one night stands and a list of never ending tasks which we all do at different stages of life, though frequency may vary from person to person and we chose not to share in public wink. A movie which has got numerous flashbacks but keeps you glued to the screen.
So finally we can see some realistic cinema being made in Bollywood which not only tells our story but also raises such issues which exist but are not usually discussed that, how we have objectified both women and men, how some of us can have "unusual" partner preferences (beauty/sex appeal/complexion/true love), how fear of rejection literally skews our mindset, how a girl who may appear stronger on the outer side too can have insecurities and fear of telling the truth and facing the consequences. If you are a true movie buff you can easily observe a lot of symbols in this movie and which goes till the end. So there's a lot of scope in this movie to keep you occupied tongue
A few things which you can't afford to miss is the amazing casting of this movie and all the actors will bowl you over with their performance. The another USP of this movie is the beautifully crafted poetic lyrics, soothing music and amazing playback, something which should not go unnoticed.
So here I am leaving you with one of my favorite songs from this movie....happy listening and happy watching

और इस टिप्पणी के बाद देखिए हंटर का टीसर...और इस फिल्म से मेरा पसंदीदा गाना


बचपन...हंटर का एक गीत...



इला जोशी
लेखिका शिक्षा से मैनेजमेंट प्रोफेश्नल हैं और नौकरी के अलावा सामाजिक एक्टिविज़्म और लेखन से भी जुड़ी हुई हैं। कम लेकिन सशक्त लिखने में रुचि है और फिल्मों की शौकीन हैं।
इनसे https://www.facebook.com/ila.joshi.5680 पर सम्पर्क किया जा सकता है।

किसी ने कहा था...

Photography is truth. The cinema is truth twenty-four times per second.
फोटोग्राफी सत्य है। सिनेमा, सच के 24 फ्रेम प्रति सेकेंड हैं।
जीन-लुक गोदार्द